कूर्म अवतार कथा – अध्याय 5: अमृत और सीख
अमृत और सीख
पिछले अध्याय में, कूर्म अवतार के अटल समर्थन ने मंदराचल पर्वत को स्थिर रखा था, जिससे देवताओं और असुरों का समुद्र मंथन जारी रहा। अथक प्रयास और भगवान विष्णु की कृपा से, अब वह क्षण आ गया था जिसका सभी को बेसब्री से इंतज़ार था - अमृत का प्राकट्य। देवताओं और असुरों दोनों के हृदय आशा और लालच से भरे हुए थे, जानते थे कि यह अमृत ही उनकी अमरता का मार्ग है।
अमृत कलश का उदय
समुद्र मंथन की गति और तीव्र हो गई। वासुकि नाग की पीड़ा बढ़ रही थी, किन्तु अमृत की आकांक्षा ने उन्हें प्रेरित रखा। तभी, क्षीरसागर के गर्भ से एक दिव्य प्रकाश उभरा। धीरे-धीरे, वह प्रकाश एक तेजस्वी कलश के रूप में प्रकट हुआ, जिसमें अमृत भरा हुआ था। कलश के चारों ओर एक अलौकिक आभा थी, जो देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर रही थी। देवताओं के चेहरे ख़ुशी से खिल उठे, जबकि असुरों की आंखें लोभ से चमक उठीं। अमृत के प्राकट्य के साथ ही देवताओं और असुरों में युद्ध की आशंका और भी बढ़ गई।
देवराज इंद्र ने देवताओं को सम्बोधित करते हुए कहा, "यह वह क्षण है जिसका हम सभी ने इंतज़ार किया है। अमृत हमारे समक्ष है, किन्तु हमें इसे प्राप्त करने के लिए सजग रहना होगा। असुर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे, हमें धर्म के मार्ग पर चलते हुए उनका सामना करना होगा।"
मोहिनी अवतार
अमृत कलश के प्रकट होते ही, देवताओं और असुरों में भीषण युद्ध छिड़ गया। दोनों ही पक्ष अमृत को पाने के लिए व्याकुल थे। असुर अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि देवता अपनी दिव्य शक्तियों का उपयोग कर रहे थे। समुद्र मंथन फिर से एक युद्ध भूमि में परिवर्तित हो गया था, जहाँ रक्त और असुरों की चीख-पुकार मची हुई थी। यह देखकर भगवान विष्णु ने जाना कि यदि इस युद्ध को नहीं रोका गया, तो अमृत असुरों के हाथ लग सकता है, जिससे धर्म का नाश हो जाएगा। तुरंत ही, उन्होंने एक अद्भुत और मनमोहक रूप धारण किया - मोहिनी अवतार।
मोहिनी अत्यंत सुंदर थीं। उनकी सुंदरता से मोहित होकर, असुरों ने अपना ध्यान युद्ध से हटा लिया। मोहित असुरों ने आपस में ही अमृत बांटने का कार्य मोहिनी को सौंप दिया। मोहिनी ने मधुर वाणी में कहा, "हे असुरों, मैं तुम्हारी सेवा में प्रसन्न हूँ, किन्तु मैं एक देवी हूँ और मुझे देवताओं और असुरों दोनों के साथ न्याय करना होगा।" यह कहकर उन्होंने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठने के लिए कहा।
अमृत और सीख
मोहिनी ने चतुराई से देवताओं को अमृत पान कराना शुरू कर दिया। असुर मोहिनी की सुंदरता में इतने खोए हुए थे कि उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। जैसे ही देवताओं ने अमृत पान कर लिया, वे अमर हो गए और उनकी शक्ति कई गुना बढ़ गई। जब मोहिनी ने असुरों को अमृत पान कराने से इंकार कर दिया, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। क्रोधित होकर, असुरों ने देवताओं पर फिर से आक्रमण कर दिया, किन्तु अब देवता अमर थे और असुरों को पराजित करने में सक्षम थे। भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार ने देवताओं को अमृत पान कराया और असुरों के अहंकार को नष्ट कर दिया। इस प्रकार, कूर्म अवतार की सहायता से, देवताओं ने अमृत प्राप्त किया और धर्म की स्थापना हुई।
अध्याय 5 का सार: यह अध्याय अमृत के प्राकट्य और देवताओं-असुरों के बीच हुए युद्ध पर केंद्रित है। भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार ने असुरों के अहंकार को चूर-चूर कर दिया और देवताओं को अमरत्व प्रदान किया। इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि अहंकार का नाश अवश्य होता है और अंततः धर्म की ही विजय होती है।
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