कूर्म अवतार कथा – अध्याय 3: मंथन की प्रक्रिया
मंथन की प्रक्रिया
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन का दुष्कर कार्य आरम्भ किया। वासुकि नाग की रस्सी बनी, मंदराचल पर्वत मथानी और कूर्म अवतार भगवान विष्णु का आधार बने। अब यह देखना था कि इस महायज्ञ से क्या निकलता है, और क्या यह सहयोग टिक पाता है।
कालकूट विष का उदय
समुद्र मंथन तीव्र गति से चल रहा था। वासुकि नाग की पीड़ा असहनीय थी, परन्तु अमृत की आशा में वे सब सह रहे थे। मंदराचल पर्वत अपनी गति से घूम रहा था, और क्षीर सागर बिलबिला उठा था। अचानक, मंथन की तीव्रता और ऊर्जा से एक भयानक विष उत्पन्न हुआ - हलाहल। यह विष इतना प्रचंड था कि उसकी ज्वालाएं तीनों लोकों को जलाने लगीं। देवता और असुर, दोनों ही भयभीत हो गए। हलाहल की उग्रता से त्राहिमाम मच गया। हर तरफ हाहाकार और घुटन थी।
देवताओं में भय था। "यह क्या हो रहा है? अमृत तो दूर रहा, यह तो प्रलय का संकेत है!" असुरों में भी चिंता थी। "यदि यह विष पूरे ब्रह्मांड को जला देगा तो अमृत का क्या लाभ?" सबको अपनी जान की चिंता सताने लगी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस विकट परिस्थिति से कैसे निकला जाए।
शिव का कल्याणकारी हस्तक्षेप
देवताओं ने भगवान शिव की स्तुति की, उनसे प्रार्थना की कि वे इस विष से संसार को बचाएं। भगवान शिव, जो आदि और अंत हैं, जो कल्याणकारी हैं, तुरंत प्रकट हुए। उन्होंने अपनी जटाओं को खोला और हलाहल विष को अपनी अंजली में लिया। माता पार्वती चिंतित थीं, परन्तु शिव जानते थे कि यह संसार को बचाने का एकमात्र उपाय है। भगवान शिव ने "ॐ नमः शिवाय" का जाप करते हुए उस प्रचंड विष को पी लिया।
भगवान विष्णु की कृपा अद्वितीय थी। उनके आशीर्वाद से, विष भगवान शिव के कंठ में अटक गया, उसे नीला कर दिया। इसलिए भगवान शिव नीलकंठ कहलाए। यह भगवान विष्णु की शक्ति ही थी जिसने विष को शिव के शरीर में फैलने से रोका, और संसार को विनाश से बचाया। यह दृश्य देखकर देवता और असुर, दोनों ही शिव की जय-जयकार करने लगे।
अमृत मंथन से रत्नों का प्रकटीकरण
विष के शांत होने के बाद, समुद्र मंथन फिर से शुरू हुआ। इस बार, मंथन से एक-एक करके अद्भुत रत्न निकलने लगे। सबसे पहले कामधेनु गाय निकली, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली थी। फिर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला, जो अपनी गति और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था। ऐरावत हाथी निकला, जो इंद्र का वाहन बना। लक्ष्मी जी, सौंदर्य और समृद्धि की देवी, सागर से प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को अपने वर के रूप में चुना।
यह सब देखकर देवता हर्षित थे। भगवान विष्णु के आशीर्वाद से, सागर पुनः अपनी शांति में लौट आया था, और एक के बाद एक दिव्य वस्तुएं प्रकट हो रही थीं। परन्तु कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी। मंदराचल पर्वत भारी था और क्षीर सागर गहरा। धीरे-धीरे पर्वत डूबने लगा, जिससे देवताओं में फिर से चिंता छा गई। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि भगवान विष्णु इस समस्या का समाधान कैसे करते हैं।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष का उदय हुआ और भगवान शिव ने संसार को बचाने के लिए उसे पी लिया। इसके बाद मंथन से कामधेनु, उच्चैश्रवा, ऐरावत और लक्ष्मी जी जैसे रत्न प्रकट हुए। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि संकट के समय भगवान पर विश्वास रखने से और निस्वार्थ भाव से कार्य करने से कल्याण होता है।
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