इंद्र और वृत्र कथा – अध्याय 5: वज्र का निर्माण

वज्र का निर्माण
पिछले अध्याय में इंद्र देव के दृढ़ संकल्प को देखकर सभी देवता प्रसन्न थे। असुर वृत्रासुर के अत्याचार से मुक्ति पाने का एक मार्ग अब प्रशस्त होता दिख रहा था। परन्तु, मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी - वृत्रासुर को मारने के लिए एक अस्त्र का अभाव। ऐसा अस्त्र जो उसकी अद्भुत शक्ति का सामना कर सके।
दधीचि ऋषि का त्याग
इंद्र, अन्य देवताओं के साथ, भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने उन्हें बताया कि वृत्रासुर को केवल एक ऐसे अस्त्र से हराया जा सकता है जो किसी महान त्यागी ऋषि की हड्डियों से बना हो। और ऐसे ऋषि थे दधीचि, जो अपनी तपस्या और परोपकार के लिए तीनो लोकों में विख्यात थे। उनकी अस्थियों में अद्भुत शक्ति विद्यमान थी, जो उन्हें वर्षों की तपस्या से प्राप्त हुई थी। इंद्र मन ही मन चिंतित थे। क्या दधीचि ऋषि अपनी अस्थियाँ दान करने के लिए तैयार होंगे?
इंद्र दधीचि ऋषि के आश्रम पहुंचे और उन्हें देवों की समस्या से अवगत कराया। उन्होंने ऋषि से प्रार्थना की, "हे ऋषि श्रेष्ठ, हम जानते हैं कि ये एक कठिन याचना है, परन्तु देवलोक और मनुष्यों को वृत्रासुर के आतंक से बचाने के लिए, हमें आपकी हड्डियों का दान चाहिए। कृपया हमारी सहायता करें।" ऋषि दधीचि ने मुस्कुराकर कहा, "हे इंद्र, यदि मेरे अस्थिदान से संसार का कल्याण होता है, तो यह मेरा परम सौभाग्य होगा। मैं तत्काल अपने प्राण त्यागने के लिए तैयार हूँ।" उनके चेहरे पर जरा भी संकोच नहीं था, बल्कि एक दिव्य तेज झलक रहा था।
वज्र का निर्माण
दधीचि ऋषि ने अपनी योग शक्ति से अपने प्राण त्याग दिए। उनकी अस्थियाँ अद्भुत तेज से चमक रही थीं। इंद्र ने उन अस्थियों को एकत्रित किया और विश्वकर्मा, देव शिल्पी, के पास ले गए। विश्वकर्मा ने देवताओं के राजा इंद्र के कहे अनुसार दधीचि ऋषि की वज्र जैसी शक्तिशाली हड्डियों से एक अद्भुत अस्त्र बनाया। उस अस्त्र का नाम रखा गया - वज्र। वज्र में दधीचि ऋषि की तपस्या की शक्ति और देवताओं की सामूहिक इच्छाशक्ति समाहित थी।
वज्र एक अद्भुत अस्त्र था। वह देखने में छोटा था, परन्तु उसमें अपार शक्ति निहित थी। उसकी चमक सूर्य के समान थी और उसकी गर्जना बादलों की गड़गड़ाहट से भी अधिक भयंकर। इंद्र ने वज्र को अपने हाथों में थामा, तो उन्हें एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्हें विश्वास हो गया कि अब वे वृत्रासुर का सामना कर सकते हैं और उसे पराजित कर सकते हैं। भगवान विष्णु ने इंद्र को आशीर्वाद दिया और कहा, "हे इंद्र, यह वज्र धर्म की रक्षा करेगा और अधर्म का नाश करेगा। तुम निश्चित रूप से वृत्रासुर पर विजय प्राप्त करोगे।"
इंद्र को वज्र की प्राप्ति
वज्र प्राप्त करने के बाद इंद्र का आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। अब वे वृत्रासुर का सामना करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार थे। उन्होंने सभी देवताओं को युद्ध की तैयारी करने का आदेश दिया। देव सेना ने शंखनाद किया और युद्ध के लिए प्रस्थान किया। इंद्र, अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर, देव सेना का नेतृत्व कर रहे थे। उनके हाथ में वज्र था, जो प्रकाश की एक किरण की तरह चमक रहा था। अब संसार इंतज़ार कर रहा था इंद्र और वृत्रासुर के महाभयंकर युद्ध का, जिस पर सभी लोकों का भविष्य टिका हुआ था। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि इंद्र किस प्रकार वज्र का उपयोग करके वृत्रासुर का वध करते हैं और देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाते हैं।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे इंद्र को वृत्रासुर का वध करने के लिए दिव्य अस्त्र वज्र प्राप्त होता है। दधीचि ऋषि का त्याग और विश्वकर्मा द्वारा वज्र का निर्माण, यह दिखाता है कि निस्वार्थ सेवा और समर्पण से बड़ी से बड़ी बाधा को भी पार किया जा सकता है। त्याग की भावना ही देवताओं को विजय दिलाती है।
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