देवी की कथाएँ

अंबा माता कथा – अध्याय 3: अंबा का तप और पुनर्जन्म

Tilak Kathayein13 Apr 2026127 views📖 1 min read
अंबा माता कथा
अंबा माता कथा का अध्याय 3 — अंबा का तप और पुनर्जन्म। अंबा भीष्म से बदला लेने के लिए कठोर तपस्या करती है और शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लेती है।

अंबा का तप और पुनर्जन्म

भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा और परशुराम के विफल हस्तक्षेप के बाद, अंबा का हृदय प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था। उसका अपमान उसे पल-पल कचोट रहा था और उसने इस अपमान का बदला लेने के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया था। परशुराम से पराजित होकर, अंबा अब समझ चुकी थी कि केवल तपस्या से ही वह अपनी इच्छा पूरी कर सकती है। उसने भगवान शिव की आराधना करने का निर्णय लिया, क्योंकि केवल वही उसे भीष्म को पराजित करने का सामर्थ्य दे सकते थे।

वन में अंबा की तपस्या

अंबा अपने प्रतिशोध की ज्वाला को हृदय में लिए, घोर वन में प्रवेश करती है। चारों ओर जंगली जानवरों की दहाड़ और पेड़ों की सरसराहट है, परन्तु अंबा के मन में केवल एक ही विचार है - भीष्म से बदला। उसने एकान्त में एक स्थान चुना और अपनी कठोर तपस्या आरम्भ कर दी। उसने भोजन त्याग दिया, केवल जल पीकर ही जीवित रही। धूप हो या वर्षा, अंबा अविचल भाव से भगवान शिव की आराधना में लीन रहती। उसकी त्वचा तप के कारण तप रही थी और शरीर क्षीण होता जा रहा था, परन्तु उसकी आत्मा दृढ़ थी।

"हे देवाधिदेव महादेव, मुझे शक्ति दो! मुझे सामर्थ्य दो कि मैं भीष्म को पराजित कर सकूँ! मेरा अपमान व्यर्थ न जाए। मैं आपको अपनी भक्ति से प्रसन्न कर, वह वरदान प्राप्त करूँगी जिससे मैं अपने अपमान का बदला ले सकूँ," अंबा अपने मन में बार-बार यही दोहराती।

भगवान शिव का वरदान

अंबा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव प्रकट होते हैं। तेजपूर्ण रूप में भगवान शिव को देखकर अंबा उनके चरणों में गिर पड़ती है। भगवान शिव उससे पूछते हैं, "हे देवी, तुम्हारी तपस्या का कारण क्या है? तुम क्या वरदान चाहती हो?" अंबा हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, "हे महादेव, मैं भीष्म से बदला लेना चाहती हूँ। मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं अगले जन्म में भीष्म का वध कर सकूँ।" भगवान शिव कुछ क्षण सोचते हैं और फिर कहते हैं, "हे देवी, तुम्हारा संकल्प अटूट है। तुम अगले जन्म में एक स्त्री के रूप में जन्म लोगी, परन्तु पुरुषत्व को प्राप्त कर भीष्म का वध करोगी। यह मेरा वरदान है।" वरदान पाकर अंबा का मन शांत हो जाता है। उसे अपने प्रतिशोध का मार्ग दिखाई देता है।

अंबा जानती थी कि भगवान शिव का वरदान कभी निष्फल नहीं होता। उसके मन में एक नई आशा का संचार हुआ। यद्यपि उसका जीवन अभी भी दुखमय था, परन्तु उसे विश्वास था कि वह अगले जन्म में अपने अपमान का बदला अवश्य लेगी। अंबा ने भगवान शिव को धन्यवाद दिया और उनके चरणों में प्रणाम किया। भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए।

शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म

भगवान शिव से वरदान प्राप्त करने के बाद, अंबा ने अग्नि में प्रवेश कर अपने शरीर का त्याग कर दिया। उसने पुनर्जन्म लिया राजा द्रुपद की पुत्री के रूप में। वह शिखंडी के नाम से जानी गई। शिखंडी स्त्री के रूप में जन्मी थी, परन्तु उसकी परवरिश एक पुरुष के समान हुई। शिखंडी को यह ज्ञात नहीं था कि वह अपने पिछले जन्म में अंबा थी, परन्तु उसके मन में भीष्म के प्रति एक अज्ञात क्रोध सदैव विद्यमान रहता था। उसका अगला लक्ष्य महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का कारण बनना था।

शिखंडी का जन्म अंबा के प्रतिशोध का फल था। भगवान शिव के वरदान और अंबा की तपस्या ने महाभारत के युद्ध की दिशा तय कर दी थी। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प और अटूट भक्ति से असंभव को भी संभव किया जा सकता है।

अध्याय 3 का सार: अंबा ने भीष्म से बदला लेने के लिए घोर तपस्या की और भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया कि वह अगले जन्म में भीष्म का वध करेगी। अंबा का शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म एक स्त्री से पुरुष बनने और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाता है।

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आज का पंचांग 29 अगस्त 2026

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