अन्नपूर्णा माता कथा – अध्याय 2: काशी में अकाल का प्रकोप

काशी में अकाल का प्रकोप
पिछले अध्याय में भगवान शिव ने पार्वती के भोजन के प्रति किए गए विचार पर संदेह व्यक्त किया था। पार्वती, अपने पति के इस अविश्वास से आहत होकर, स्वयं को सिद्ध करने का निश्चय करती हैं। इस निश्चय के साथ ही, एक अप्रत्याशित घटना घटती है जो पूरे ब्रह्मांड को हिला देती है।
पार्वती का अंतर्ध्यान
पार्वती के मन में एक गहरा दुःख समा गया। उनके चेहरे पर उदासी छा गई और उनकी आंखों में आंसू भर आए। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति का उपयोग करते हुए, स्वयं को अदृश्य कर लिया। कैलास पर्वत पर सन्नाटा छा गया। भगवान शिव ने जब पार्वती को अपने आस-पास नहीं पाया तो उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने हर जगह खोजा, पर पार्वती कहीं नहीं मिलीं। चारों ओर निराशा का माहौल था, मानो किसी ने खुशियों को चुरा लिया हो।
भगवान शिव व्याकुल होकर बोले, "हे पार्वती, तुम कहां हो? मुझसे क्या भूल हुई जो तुम मुझसे रूठ गई? कृपया प्रकट हो जाओ, तुम्हारे बिना यह संसार सूना लग रहा है।" उनके हृदय में पश्चाताप की अग्नि जल रही थी। उन्होंने समझ लिया था कि पार्वती का अदृश्य होना केवल एक साधारण घटना नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय संकेत है।
पृथ्वी पर अकाल का तांडव
पार्वती के अंतर्ध्यान होते ही पृथ्वी पर अकाल का प्रकोप छा गया। अन्न के भंडार खाली हो गए, नदियाँ सूख गईं, और खेत बंजर हो गए। लोग भूख से तड़पने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया। माताएं अपने बच्चों को गोद में लिए भोजन की तलाश में भटक रही थीं। वृद्ध और असहाय लोग भूख से बेदम होकर सड़कों पर गिर रहे थे। काशी नगरी, जो कभी अन्न और समृद्धि से भरी रहती थी, अब भूख और निराशा का प्रतीक बन गई थी।
अन्नपूर्णा माता के अदृश्य होने से पृथ्वी पर अन्न का अभाव हो गया। माना जाता है कि जब माता पार्वती साक्षात अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान होती हैं, तभी पृथ्वी पर अन्न की प्रचुरता बनी रहती है। उनके अंतर्ध्यान होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया, और अन्न की देवी के बिना पृथ्वी पर जीवन कठिन हो गया। लोग अपने घरों में बंद होकर भूख से व्याकुल थे, और चारों ओर निराशा का साया मंडरा रहा था।
काशी में त्राहिमाम
काशी नगरी में हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। लोग भूख से बेहाल होकर सड़कों पर गिर रहे थे। बच्चे अपनी मांओं से भोजन मांग रहे थे, और माताएं उन्हें शांत करने के लिए बेबस थीं। भगवान शिव के भक्त भी भूख से त्रस्त थे और उनकी पूजा-अर्चना करने में असमर्थ थे। इस भयंकर अकाल ने काशी को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। इस भयावह स्थिति के कारण भगवान शिव को एहसास हुआ कि उन्हें अन्नपूर्णा से याचना करनी होगी। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि शिव किस प्रकार अन्नपूर्णा को वापस लाने का प्रयास करते हैं और काशी को इस अकाल से मुक्ति दिलाते हैं।
अध्याय 2 का सार: पार्वती के अदृश्य होने से पृथ्वी पर अकाल छा गया, विशेषकर काशी नगरी में। इस अकाल के कारण लोगों में त्राहिमाम मच गया, जिससे भगवान शिव को अन्नपूर्णा के महत्व का एहसास हुआ। यह अध्याय हमें सिखाता है कि भोजन का सम्मान करना और उसे व्यर्थ न करना कितना महत्वपूर्ण है।
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