अन्नपूर्णा माता कथा – अध्याय 1: शिव का संदेह और पार्वती

शिव का संदेह और पार्वती
कैलाश पर्वत पर सदा की भांति शांति छाई हुई थी। भोलेनाथ शिव समाधि में लीन थे और माता पार्वती उनकी सेवा में तत्पर थीं। वातावरण में भक्ति और आनंद का वास था, मानो प्रकृति भी उनके प्रेम की साक्षी हो। परन्तु विधि को कुछ और ही स्वीकार्य था।
अन्न माया है!
शिव समाधि से जागे। उनकी जटाएँ सूर्य की किरणों के समान चमक रही थीं। उन्होंने अपने नेत्र खोले और पार्वती की ओर देखा। उनके चेहरे पर एक विचित्र सी उदासीनता थी, जो पार्वती को कभी ज्ञात नहीं थी। वातावरण में एक क्षण के लिए अजीब सी खामोशी छा गई। पक्षियों का कलरव भी थम गया, मानो वे भी किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त हों।
शिव ने धीरे से कहा, "पार्वती, यह संसार माया है। अन्न, जल, सब कुछ भ्रम है। आत्मा ही सत्य है, और उसी में लीन होना परम ध्येय है।" उनकी वाणी में अटल विश्वास था, परन्तु पार्वती को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। वह जानती थी कि शिव ज्ञानी हैं, परन्तु अन्न को माया कहना उनके मन को स्वीकार नहीं हुआ।
पार्वती ने नम्रता से पूछा, "स्वामी, अन्न को माया कैसे कह सकते हैं? यह तो जीवन का आधार है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी सब अन्न से ही जीवित रहते हैं। यह तो ब्रह्मा का दिया हुआ वरदान है।"
"पार्वती," शिव ने उत्तर दिया, "यह सत्य है कि अन्न जीवन का आधार है, परन्तु यह केवल भौतिक शरीर को पोषण देता है। आत्मा को तो ज्ञान और वैराग्य से ही तृप्ति मिलती है। यह अन्न का बंधन अंततः मनुष्य को मोह में बांधता है, जिससे वह परम सत्य से दूर हो जाता है।"
पार्वती का क्रोध
शिव के वचन पार्वती के हृदय में बाण की तरह लगे। उन्हें क्रोध आ गया। उनकी आंखें लाल हो गईं और उनका मुख मंडल तेज से चमकने लगा। जिस अन्न को वह स्वयं इतना महत्व देती थीं, उसे उनके स्वामी ने माया कह दिया था। यह उनके लिए असहनीय था। उन्होंने सोचा, "यदि अन्न माया है, तो संसार कैसे जीवित रहेगा? यदि अन्न का कोई महत्व नहीं, तो फिर यह सृष्टि किस आधार पर टिकी है?"
क्रोध में भरकर पार्वती ने कहा, "हे शिव! यदि अन्न माया है, तो मैं इस अन्न की शक्ति को सिद्ध करके दिखाऊंगी। मैं इस संसार को अन्न के महत्व का ज्ञान कराऊंगी। मैं अन्नपूर्णा का रूप धारण करूंगी और संसार को भोजन प्रदान करूंगी। तब आप समझेंगे कि अन्न माया नहीं, जीवन का सार है।"
यह कहकर पार्वती अंतर्ध्यान हो गईं। कैलाश पर्वत पर सन्नाटा छा गया। शिव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने पार्वती को क्रोधित कर दिया था और अब उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। परन्तु वे जानते थे कि पार्वती जो भी करेंगी, वह लोक कल्याण के लिए ही होगा।
पार्वती ने अन्नपूर्णा का रूप धारण किया। उनका रूप अत्यंत तेजस्वी और शांत था। उनके एक हाथ में अन्न का स्वर्ण कलश था और दूसरे हाथ में करुणा से भरी दृष्टि। उन्होंने निश्चय किया कि वे संसार के प्रत्येक प्राणी को अन्न प्रदान करेंगी और अन्न के महत्व को स्थापित करेंगी। उनकी कृपा से धरती हरी-भरी हो गई और अन्न के भंडार भर गए।
कैलाश से काशी की ओर
पार्वती के अंतर्ध्यान होने के बाद, शिव को अकेलापन महसूस हुआ। उन्हें पार्वती की याद सताने लगी, परन्तु उन्हें यह भी ज्ञात था कि यह उनकी परीक्षा का समय है। वह जानते थे कि अब संसार में एक बड़ी घटना घटने वाली है, जिसका प्रभाव सभी पर पड़ेगा।
उसी समय, काशी नगरी में अकाल का प्रकोप फैल गया। अन्न की कमी से त्राहि-त्राहि मच गई। लोग भूख से मरने लगे और हाहाकार मच गया। शिव ने यह दृश्य देखा और उन्हें पार्वती की चिंता हुई। वे जानते थे कि अब अन्नपूर्णा ही काशी के लोगों को बचा सकती हैं। इसलिए, शिव ने काशी की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया, ताकि वह अन्नपूर्णा से मिलकर लोगों को इस संकट से मुक्ति दिला सकें, परन्तु उन्हें यह नहीं पता था कि काशी में उनके लिए एक और बड़ी परीक्षा प्रतीक्षा कर रही है।
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में, भगवान शिव अन्न को माया बताते हैं, जिससे माता पार्वती क्रोधित हो जाती हैं और अन्नपूर्णा का रूप धारण करने का निश्चय करती हैं। शिव को अपनी भूल का एहसास होता है और काशी में अकाल का प्रकोप देखकर वे चिंतित हो जाते हैं। इससे अगला अध्याय काशी में अकाल के संकट पर केंद्रित होगा। आध्यात्मिक सार यह है कि अन्न जीवन का आधार है और इसका अपमान नहीं करना चाहिए।
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