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वराह अवतार कथा – अध्याय 4: बुराई पर विजय

Tilak Kathayein13 Apr 2026168 views
वराह अवतार कथा
वराह अवतार कथा का अध्याय 4 — बुराई पर विजय। भयंकर युद्ध में वराह भगवान हिरण्याक्ष का वध करते हैं और पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण कर ऊपर लाते हैं।

बुराई पर विजय

पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार पृथ्वी रसातल में डूब गई थी और भगवान वराह ने उसे बचाने का संकल्प लिया था। अब, घोर युद्ध का समय आ गया था, एक ऐसा युद्ध जो धर्म और अधर्म के बीच, अच्छाई और बुराई के बीच लड़ा जाना था। सृष्टि इस निर्णायक क्षण का साक्षी बनने के लिए मानो थम सी गई थी।

महायुद्ध का आरंभ

भगवान वराह, अपने विशालकाय दांतों पर पृथ्वी को उठाए, रसातल से ऊपर उठे। उनका रूप तेजस्वी था, मानो सूर्य की कांति उनमें समाहित हो। उनके क्रोधित नेत्र हिरण्याक्ष को ढूंढ रहे थे, जो अपनी आसुरी शक्ति के मद में चूर, समुद्र की गहराइयों में छिपा बैठा था। समुद्र में प्रचंड हलचल मची हुई थी, मानो दो पर्वतों का आपस में टकराव हो रहा हो। मछलियाँ और अन्य जलचर भयभीत होकर इधर-उधर भाग रहे थे। भगवान वराह की गर्जना से तीनों लोक कांप उठे। यह युद्ध अब टाला नहीं जा सकता था।

हिरण्याक्ष गरज उठा, "कौन है यह जो मेरे साम्राज्य में घुसने का साहस कर रहा है? मुझे ललकारने वाला यह वराह कौन है? मैं अपनी गदा से इसका अंत कर दूंगा!" उसने अपनी शक्तिशाली गदा उठाई, जो देखने में काल के समान भयानक लग रही थी, और गरजते हुए वराह भगवान की ओर दौड़ा। उसका हृदय अहंकार और क्रोध से भरा हुआ था।

हिरण्याक्ष का वध

दोनों योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। हिरण्याक्ष ने अपनी गदा से वराह भगवान पर भीषण प्रहार किया, लेकिन भगवान वराह ने अपने मजबूत शरीर से उस प्रहार को विफल कर दिया। भगवान वराह ने भी अपनी दाढ़ों से हिरण्याक्ष पर आक्रमण किया, जिससे उसका शरीर लहूलुहान हो गया। युद्ध के दौरान, समुद्र का पानी खून से लाल हो गया, मानो धरती का क्रोध ही उमड़ आया हो। देवता भयभीत किन्तु आशान्वित होकर स्वर्ग से यह दृश्य देख रहे थे।

भगवान वराह, जो वास्तव में विष्णु का ही अवतार थे, अपनी माया से हिरण्याक्ष के सारे प्रयासों को विफल कर रहे थे। अंततः, वराह भगवान ने अपने चक्र से हिरण्याक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। हिरण्याक्ष की मृत्यु के साथ ही, रसातल में छाया हुआ अंधकार छंटने लगा, मानो सूर्य का प्रकाश फिर से फैल गया हो। असुरों में हाहाकार मच गया। विष्णु की कृपा से धर्म की विजय हुई थी।

पृथ्वी की स्थापना

हिरण्याक्ष के वध के बाद, भगवान वराह ने पृथ्वी को अपने दांतों पर धारण किए हुए, उसे धीरे-धीरे जल से ऊपर उठाया। उन्होंने पृथ्वी को उसकी पूर्व स्थिति में स्थापित किया, जिससे चारों ओर शांति और खुशी का माहौल छा गया। पृथ्वी, जो रसातल में डूबकर व्याकुल थी, अब पुनः स्थापित होकर आनंदित हो गई। पेड़-पौधे फिर से लहराने लगे, नदियाँ कलकल बहने लगीं, और समस्त जीव-जंतु खुशी से चहचहाने लगे।

पृथ्वी को बचाने के बाद, भगवान वराह ने अपना दिव्य रूप दिखाया। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की, और स्वर्ग में देवताओं ने पुष्प वर्षा की। वराह भगवान ने आश्वासन दिया कि जब भी धर्म की हानि होगी और अधर्म बढ़ेगा, वे अवश्य ही अवतार लेंगे और बुराई का नाश करेंगे। अब समय था, पृथ्वी पर जीवन को फिर से शुरू करने का, एक नई शुरुआत का, जो शांति और प्रेम से भरी होगी।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को बचाया। यह हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है। भगवान विष्णु का अवतार, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

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आज का पंचांग 1 नवम्बर 2026

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