तुलसी माता कथा – अध्याय 2: जलंधर की शक्ति का उदय

जलंधर की शक्ति का उदय
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार वृन्दा एक धर्मात्मा और पतिव्रता रानी थीं, जो अपने पति जलंधर को ईश्वर तुल्य मानती थीं। उसकी पवित्रता और तपस्या ही जलंधर की शक्ति का स्रोत थी। पर नियति को तो कुछ और ही स्वीकार था, क्योंकि जलंधर के हृदय में अहंकार का विष फैलने लगा था, और यही विष उसके विनाश का कारण बनने वाला था।
स्वर्ग पर आक्रमण की घोषणा
समुद्र की लहरों की भांति जलंधर की सेना अजेय प्रतीत होती थी। उसके रथ पर ध्वजा फहरा रही थी, स्वर्ण कवच सूर्य की किरणों में चमक रहा था। उसके नेत्रों में विजय की अग्नि प्रज्वलित थी। उसने अपने सेनापतियों को आज्ञा दी, "आज हम स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे! इंद्र का सिंहासन आज जलंधर का होगा! देवताओं को दिखा दो कि इस ब्रह्मांड में अब एक और शक्तिशाली राजा है!" उसकी गर्जना सुनकर सेना में उत्साह की लहर दौड़ गई। सैनिकों ने 'जलंधर की जय' के नारे लगाए, जो आकाश में गूंज उठे। पर कहीं न कहीं, किसी ने उस अहंकार को महसूस किया, जो विनाश की ओर ले जा रहा था।
जलंधर ने मन ही मन सोचा, "वृंदा की शक्ति मेरे साथ है। उसकी पवित्रता मुझे हर युद्ध में विजयी बनाएगी। देवता क्या, तीनों लोकों में कोई भी मुझे पराजित नहीं कर सकता।" किन्तु उसे यह नहीं पता था कि यही अहंकार उसकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी। उसने वृंदा की शक्ति को अपनी मान लिया था, ईश्वर का आशीर्वाद समझकर उसका अभिमान करने लगा था।
देवताओं की पराजय
स्वर्ग लोक में हाहाकार मच गया। जलंधर की सेना ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्र और अन्य देवता पूरी शक्ति से लड़े, परन्तु जलंधर के सामने उनकी एक न चली। देवताओं की सेना हारने लगी। इंद्र का वज्र भी जलंधर का बाल बांका न कर सका, क्योंकि वृंदा की पवित्रता का कवच जलंधर को सुरक्षित रखे हुए था। स्वर्ग के द्वार टूट गए, और जलंधर की सेना ने स्वर्ग में प्रवेश कर लिया। देवताओं को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।
वृंदा की पवित्रता एक ढाल की तरह जलंधर की रक्षा कर रही थी। उसके तप और धर्म के कारण ही जलंधर अजेय बना हुआ था। देवताओं के अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे स्वयं प्रकृति भी जलंधर के साथ है, क्योंकि वृंदा का धर्म इतना प्रबल था कि वह ब्रह्मांडीय शक्तियों को भी प्रभावित कर रहा था।
अहंकार का विष
स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद जलंधर का अभिमान सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने इंद्र के सिंहासन पर बैठकर घोषणा की, "आज से स्वर्ग लोक पर जलंधर का शासन होगा! देवता मेरे दास होंगे!" उसने देवताओं को बंदी बना लिया और उन्हें अपने सामने झुकने पर मजबूर किया। जलंधर की शक्ति और अहंकार दोनों ही तेजी से बढ़ रहे थे, और यही देवताओं के लिए चिंता का विषय बन गया। अब वे किसकी शरण में जाएँ? क्या वृंदा की पवित्रता के सामने उनकी कोई शक्ति काम कर पाएगी? अगले अध्याय में हम देखेंगे कि देवताओं ने जलंधर के अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए क्या योजना बनाई।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे जलंधर ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए स्वर्ग पर आक्रमण किया और देवताओं को पराजित किया। वृंदा की पवित्रता ने उसकी शक्ति को बढ़ाया, लेकिन उसके अहंकार ने उसे विनाश की ओर अग्रसर किया। यह अध्याय हमें यह शिक्षा देता है कि शक्ति को कभी भी अभिमान में नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि अहंकार पतन का कारण बनता है।
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