त्रिपुर सुंदरी कथा – अध्याय 3: भण्डासुर राक्षस का उदय

भण्डासुर राक्षस का उदय
कामदेव के पुनर्जन्म के साथ ही सृष्टि में एक नए युग का आरम्भ हुआ। परन्तु, यह शांति चिरकाल तक नहीं टिक सकी। एक भीषण छाया धीरे-धीरे देवताओं के स्वर्गीय साम्राज्य पर छाने लगी, एक ऐसे भय का उदय हुआ जिसकी कल्पना करना भी देवताओं के लिए कठिन था। यह छाया थी भण्डासुर राक्षस की, जिसके अत्याचारों से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी।
भण्डासुर की उत्पत्ति
एक बार, भगवान शिव की तपस्या भंग करने के उद्देश्य से कामदेव ने उन पर पुष्प बाण चलाया था। क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आँख खोली जिससे कामदेव भस्म हो गए थे। उसी अग्नि की राख को असुरों ने एकत्र किया। उन्होंने उस राख को मंत्रों और तंत्रों के माध्यम से अभिमंत्रित किया, जिससे एक भयानक प्राणी का जन्म हुआ। उसका शरीर पर्वत के समान विशाल था, नेत्र अंगारे की तरह जल रहे थे, और उसकी गर्जना से पृथ्वी कांप उठती थी। यह था भण्डासुर, एक ऐसा राक्षस जिसके हृदय में केवल विनाश और अत्याचार ही भरे हुए थे। उसके जन्म के साथ ही आकाश लाल हो गया, पृथ्वी डोलने लगी और प्रकृति में हाहाकार मच गया।
“मैं हूँ भण्डासुर! अब यह त्रिलोक मेरा है! देवता और मनुष्य मेरे चरणों में झुकेंगे!” भण्डासुर ने अहंकार से दहाड़ते हुए कहा। उसके सहयोगी असुर उसकी जय-जयकार करने लगे, उनके हृदय में देवताओं के प्रति घृणा और भी बढ़ गई। भण्डासुर ने असुरों को एकत्रित करके अपनी विशाल सेना का गठन किया और स्वर्गलोक पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा। उसका उद्देश्य था देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित करना।
देवताओं पर अत्याचार
भण्डासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। उसने स्वर्ग के सुंदर उद्यानों को उजाड़ दिया, पवित्र मंदिरों को नष्ट कर दिया, और देवताओं को उनके सिंहासन से बेदखल कर दिया। देवता भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। इंद्र, वरुण, कुबेर और अन्य शक्तिशाली देवता भी भण्डासुर के सामने टिक नहीं पाए। भण्डासुर का अत्याचार इतना बढ़ गया कि यज्ञ और हवन बंद हो गए, धार्मिक अनुष्ठान रुक गए, और तीनों लोकों में अधर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया। देवियाँ अपने सम्मान की रक्षा के लिए छिपने को विवश हो गईं। वे निराशा और भय से भर गईं, क्योंकि उन्हें कोई भी ऐसा नहीं दिख रहा था जो उन्हें भण्डासुर के अत्याचारों से बचा सके।
देवताओं ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की, “हे पितामह! भण्डासुर के अत्याचारों से हमें बचाइए! वह हमें जीवित नहीं छोड़ेगा। कृपया हमें बताइए कि हम इस संकट से कैसे उबरें।” ब्रह्माजी ने शांत भाव से उत्तर दिया, “केवल आदि पराशक्ति त्रिपुर सुंदरी ही भण्डासुर का वध कर सकती हैं। तुम सब उनकी शरण में जाओ। वही तुम्हारी रक्षा करेंगी।”
त्रिपुर सुंदरी से सहायता की प्रार्थना
ब्रह्माजी के आदेशानुसार सभी देवता एकत्रित होकर मणिद्वीप पहुंचे, जहाँ आदि पराशक्ति त्रिपुर सुंदरी विराजमान थीं। वे सभी अत्यंत विनम्र भाव से देवी के सामने उपस्थित हुए और उन्हें भण्डासुर के अत्याचारों के बारे में बताया। देवताओं ने देवी के चरणों में गिरकर प्रार्थना की, “हे माँ! हम आपकी शरण में आए हैं। भण्डासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा है। कृपया हमें उसके अत्याचारों से मुक्त कीजिए। हे जगदम्बे! आप ही हमारी अंतिम आशा हैं।”
देवताओं की करुण पुकार सुनकर त्रिपुर सुंदरी का हृदय द्रवित हो गया। उनकी आँखों से करुणा की धारा बह निकली। उन्होंने देवताओं को अभयदान देते हुए कहा, “डरो मत देवताओं! मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करुँगी। भण्डासुर का वध करने के लिए मैं शीघ्र ही अपनी शक्तियों को एकत्रित करुँगी और उसे पराजित करुँगी। अब तुम सब निश्चिंत होकर अपने-अपने लोकों को लौट जाओ। शीघ्र ही भण्डासुर का अंत होगा।” त्रिपुर सुंदरी के अभयदान से देवताओं के मन में आशा की एक नई किरण जगी। वे कृतज्ञ भाव से देवी को प्रणाम करके अपने-अपने लोकों को लौट गए। अब वे त्रिपुर सुंदरी के युद्ध की तैयारी करने की प्रतीक्षा कर रहे थे, जानते हुए कि अब शीघ्र ही उनका उद्धार होगा।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में भण्डासुर राक्षस की उत्पत्ति और उसके द्वारा देवताओं पर किए गए अत्याचारों का वर्णन है। देवता त्रिपुर सुंदरी से सहायता की प्रार्थना करते हैं, जो उनकी रक्षा का वचन देती हैं। इस अध्याय का आध्यात्मिक सन्देश यह है कि जब धर्म पर अधर्म का प्रभाव बढ़ता है, तो दिव्य शक्ति ही उसे नष्ट करने के लिए प्रकट होती है।
आज का पंचांग 1 अगस्त 2026
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