एकादशी व्रत कथा

Devshayani Ekadashi in Hindi | देवशयनी एकादशी व्रत कथा - 2026

Tilak Kathayein20 May 2026358 views📖 1 min read
देवशयनी एकादशी – Devshayani Ekadashi
देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र एकादशी है, जिसके साथ चातुर्मास का शुभारंभ माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस लेख में जानें देवशयनी एकादशी की व्रत कथा, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व, चातुर्मास का महत्व और इस व्रत से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ।

देवशयनी एकादशी – परिचय

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इसे 'पद्मा एकादशी', 'हरिबोधनी एकादशी' या 'देव प्रबोधिनी एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीर सागर में विश्राम करते हैं, जिस कारण इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दौरान सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं।

सभी एकादशियों में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व है। इसे 'पद्मा एकादशी' भी कहते हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु कमल पर विराजमान होते हैं। इसे सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है क्योंकि इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है, जो अत्यंत पुण्यदायक काल होता है।

देवशयनी एकादशी का महत्त्व:

ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यह एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसे योगिनी एकादशी कहते हैं, के बाद आती है।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्षकी एकादशी को हीदेवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसी एकादशी से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह आदि नहीं किया जाता। मान्यता है कि, इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर चार माह बाद उन्हें उठाया जाता है। उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। इस बीच के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है।

देवशयनी एकादशी कोदेव देवशयनी, महा एकादशी, थोली एकादशी(तेलुगू), हरि देवशयनी, पद्मनाभा, शयनी तथा प्रबोधनी एकादशीभी कहा जाता है।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा: हे केशव! आषाढ़ शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत के करने की विधि क्या है और किस देवता का पूजन किया जाता है? श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! जिस कथा को ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था वही मैं तुमसे कहता हूँ।

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया: सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। किंतु भविष्य में क्या हो जाए, यह कोई नहीं जानता। अतः वे भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है।

उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इस अकाल से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि में कमी हो गई। जब मुसीबत पड़ी हो तो धार्मिक कार्यों में प्राणी की रुचि कहाँ रह जाती है। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना की दुहाई दी।

राजा तो इस स्थिति को लेकर पहले से ही दुःखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन-सा पाप-कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है? फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए।

वहाँ विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषिवर ने आशीर्वचनोपरांत कुशल क्षेम पूछा। फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा।

तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा: महात्मन्‌! सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूँ। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया इसका समाधान करें।

यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा: हे राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है।

इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा। दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से ही संभव है।

किंतु राजा का हृदय एक नरपराध शूद्र तपस्वी का शमन करने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा: हे देव मैं उस निरपराध को मार दूँ, यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप कोई और उपाय बताएँ।

महर्षि अंगिरा ने बताया: आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।

राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

व्रत विधि

दशमी की रात्रि से ही व्रत की तैयारी शुरू हो जाती है। इस रात सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जमिनी पर सोना भी उत्तम माना जाता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के समक्ष व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की पूजा करें, उन्हें पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें और तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं।

समयकरने का कार्य
प्रातःकालउठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
सुबहभगवान विष्णु का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें।
दोपहरभगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा करें। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
संध्याकालभगवान विष्णु की आरती करें और भजन-कीर्तन करें।
रात्रिफलाहार ग्रहण करें और भगवान का ध्यान करते हुए सोएं।

द्वादशी के दिन, व्रत का पारण शुभ मुहूर्त में किया जाता है। स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके पश्चात स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

देवशयनी एकादशी का व्रत रखते समय फलाहार, दूध, दही, पनीर, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना और मेवे खाए जा सकते हैं। यह सभी वस्तुएं सात्विक होती हैं और व्रत के नियमों के अनुरूप हैं।

इस व्रत में चावल, दाल, गेहूं, बेसन, लहसुन, प्याज और किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन वर्जित है। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाना पाप के समान है। लहसुन-प्याज का सेवन भी तामसिक माना जाता है, जो व्रत की पवित्रता को भंग करता है।

देवशयनी एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप कर्मों का नाश हो जाता है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत मनुष्य को नरक की यातनाओं से बचाता है।
  • मोक्ष प्राप्ति – जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे भगवान विष्णु के लोक में स्थान पाते हैं।
  • सांसारिक लाभ – इस व्रत के पुण्य से मनुष्य को धन, धान्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और सौभाग्य में वृद्धि होती है।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है और विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में देवशयनी एकादशी कब है?

2026 में देवशयनी एकादशी 20 जुलाई, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:20 से 08:59 तक रहेगा।

देवशयनी एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ऋषि मेधावी को अपने पिता ने श्राप दिया था कि वह राक्षस बन जाएं। ऋषि ने एक एकादशी का व्रत किया और उसी दिन चावल खा लिए, जिसके कारण उनका श्राप और बढ़ गया। इसलिए यह माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से पाप लगता है।

क्या बीमार व्यक्ति देवशयनी एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, गर्भवती महिलाएं या वृद्धजन यदि पूर्ण उपवास न रख सकें तो वे फलाहार कर सकते हैं या दिन में एक बार सात्विक भोजन कर सकते हैं। वे बिना अन्न का सेवन किए भी व्रत कर सकते हैं।

निष्कर्ष

देवशयनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है, क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी चार माह की योग निद्रा में लीन हो जाते हैं। इस अवधि में वे सृष्टि का भार शिवजी को सौंप देते हैं। जो भक्त इस एकादशी का विधिपूर्वक व्रत रखते हैं, भगवान विष्णु उन्हें धन, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं और अंत में मोक्ष प्रदान करते हैं। यही कारण है कि इसे सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ देवशयनी एकादशी का व्रत करना चाहिए। यह व्रत न केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

क्या आपने कभी देवशयनी एकादशी का व्रत रखा है? अपना अनुभव, श्रद्धा और इस पावन व्रत से जुड़ी अपनी भावना हमारे साथ कमेंट में साझा करें।

एकादशी व्रत, सनातन धर्म, धार्मिक कथाओं और भक्तिमय जानकारी से जुड़े ऐसे ही रोचक लेख पढ़ने के लिए Tilak Kathayein के साथ जुड़े रहें।

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