Yogini Ekadashi | योगिनी एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

📋 विषय सूची
योगिनी एकादशी – परिचय
योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। 2026 में, योगिनी एकादशी १० जुलाई को मनाई जाएगी। इस एकादशी का नाम 'योगिनी' इसलिए है क्योंकि यह व्रत करने वाले को सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है।
सभी एकादशियों में योगिनी एकादशी का विशेष स्थान है। इसे 'सर्वपाप-हरा' एकादशी भी कहा जाता है, अर्थात यह सभी प्रकार के पापों को नष्ट करने वाली है। पुराणों के अनुसार, इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है और वह समस्त कष्टों से मुक्त हो जाता है।
योगिनी एकादशी की व्रत कथा
महाभारत काल की बात है कि एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण कहा: हे त्रिलोकीनाथ! मैंने ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी की कथा सुनी। अब आप कृपा करके आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइये। इस एकादशी का नाम तथा माहात्म्य क्या है? सो अब मुझे विस्तारपूर्वक बतायें।
श्रीकृष्ण ने कहा: हे पाण्डु पुत्र! आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। इसके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत इस लोक में भोग तथा परलोक में मुक्ति देने वाला है।
हे धर्मराज! यह एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। इसके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। तुम्हें मैं पुराण में कही हुई कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- कुबेर नाम का एक राजा अलकापुरी नाम की नगरी में राज्य करता था। वह शिव-भक्त था। उनका हेममाली नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेममाली की विशालाक्षी नाम की अति सुन्दर स्त्री थी।
एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प लेकर आया, किन्तु कामासक्त होने के कारण पुष्पों को रखकर अपनी स्त्री के साथ रमण करने लगा। इस भोग-विलास में दोपहर हो गई।
हेममाली की राह देखते-देखते जब राजा कुबेर को दोपहर हो गई तो उसने क्रोधपूर्वक अपने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर पता लगाओ कि हेममाली अभी तक पुष्प लेकर क्यों नहीं आया। जब सेवकों ने उसका पता लगा लिया तो राजा के पास जाकर बताया- हे राजन! वह हेममाली अपनी स्त्री के साथ रमण कर रहा है।
इस बात को सुन राजा कुबेर ने हेममाली को बुलाने की आज्ञा दी। डर से काँपता हुआ हेममाली राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसे देखकर कुबेर को अत्यन्त क्रोध आया और उसके होंठ फड़फड़ाने लगे।
राजा ने कहा: अरे अधम! तूने मेरे परम पूजनीय देवों के भी देव भगवान शिवजी का अपमान किया है। मैं तुझे श्राप देता हूँ कि तू स्त्री के वियोग में तड़पे और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी का जीवन व्यतीत करे।
कुबेर के श्राप से वह तत्क्षण स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा और कोढ़ी हो गया। उसकी स्त्री भी उससे बिछड़ गई। मृत्युलोक में आकर उसने अनेक भयंकर कष्ट भोगे, किन्तु शिव की कृपा से उसकी बुद्धि मलिन न हुई और उसे पूर्व जन्म की भी सुध रही। अनेक कष्टों को भोगता हुआ तथा अपने पूर्व जन्म के कुकर्मो को याद करता हुआ वह हिमालय पर्वत की तरफ चल पड़ा।
चलते-चलते वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में जा पहुँचा। वह ऋषि अत्यन्त वृद्ध तपस्वी थे। वह दूसरे ब्रह्मा के समान प्रतीत हो रहे थे और उनका वह आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान शोभा दे रहा था। ऋषि को देखकर हेममाली वहाँ गया और उन्हें प्रणाम करके उनके चरणों में गिर पड़ा।
हेममाली को देखकर मार्कण्डेय ऋषि ने कहा: तूने कौन-से निकृष्ट कर्म किये हैं, जिससे तू कोढ़ी हुआ और भयानक कष्ट भोग रहा है।
महर्षि की बात सुनकर हेममाली बोला: हे मुनिश्रेष्ठ! मैं राजा कुबेर का अनुचर था। मेरा नाम हेममाली है। मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था। एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा और दोपहर तक पुष्प न पहुँचा सका। तब उन्होंने मुझे शाप श्राप दिया कि तू अपनी स्त्री का वियोग और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी बनकर दुख भोग। इस कारण मैं कोढ़ी हो गया हूँ तथा पृथ्वी पर आकर भयंकर कष्ट भोग रहा हूँ, अतः कृपा करके आप कोई ऐसा उपाय बतलाये, जिससे मेरी मुक्ति हो।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा: हे हेममाली! तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए मैं तेरे उद्धार के लिए एक व्रत बताता हूँ। यदि तू आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएँगे।
महर्षि के वचन सुन हेममाली अति प्रसन्न हुआ और उनके वचनों के अनुसार योगिनी एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करने लगा। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आ गया और अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
भगवान श्री कृष्ण ने कहा: हे राजन! इस योगिनी एकादशी की कथा का फल 88000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। इसके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में मोक्ष प्राप्त करके प्राणी स्वर्ग का अधिकारी बनता है।
व्रत विधि
दशमी की रात को सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। देर रात तक नहीं जागना चाहिए और जमीन पर सोना चाहिए।
एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की पूजा के लिए फूल, फल, तुलसी दल, धूप, दीप आदि अर्पित करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें।
| समय | करने का कार्य |
|---|---|
| प्रातःकाल | उठकर स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें। |
| सूर्योदय के पश्चात | भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करें। |
| पूरे दिन | व्रत रखें, अन्न ग्रहण न करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। |
| शाम को | भगवान विष्णु की आरती करें और भजन-कीर्तन करें। |
| रात्रि में | जागरण करें और भगवान का स्मरण करें। |
द्वादशी के दिन, सूर्योदय के पश्चात स्नान कर ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दें। इसके बाद पारण मुहूर्त में व्रत खोलें। पारण के लिए सात्विक भोजन जैसे फल, दही, या हलवा ग्रहण कर सकते हैं।
व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं
योगिनी एकादशी के व्रत में फलाहार का विधान है। आप फल, दूध, दही, मेवे, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, और साबूदाना खा सकते हैं। इन खाद्य पदार्थों को खाने से व्रत की पवित्रता बनी रहती है।
योगिनी एकादशी के व्रत में चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है। इसके अलावा, किसी भी प्रकार की दाल, लहसुन, प्याज, और मांसाहार का सेवन भी नहीं करना चाहिए। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि कहा जाता है कि चावल में जल तत्व की अधिकता होती है और एकादशी के दिन जल तत्व का सेवन त्यागना चाहिए।
योगिनी एकादशी व्रत के लाभ
- पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। पुराणों के अनुसार, यह व्रत समस्त पापों को भस्म करने की क्षमता रखता है।
- मोक्ष प्राप्ति – योगिनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह भगवान विष्णु के लोक में स्थान पाता है।
- सांसारिक लाभ – यह व्रत व्यक्ति को जीवन में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है। सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
- स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है और शरीर से विषाक्त तत्व बाहर निकलते हैं, जिससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2026 में योगिनी एकादशी कब है?
2026 में योगिनी एकादशी 20 जून, शनिवार के दिन मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त सुबह 08:08 से अगले दिन सुबह 07:10 तक रहेगा।
योगिनी एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चावल को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है और एकादशी के दिन जल तत्व का सेवन वर्जित है। कुछ कथाओं के अनुसार, चावल को महर्षि मेधा की पुत्री माना जाता है, जिनका सेवन करने से व्यक्ति को पाप लगता है।
क्या बीमार व्यक्ति योगिनी एकादशी व्रत रख सकता है?
जी हां, बीमार, गर्भवती महिलाएं या वृद्ध व्यक्ति यदि पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, तो वे फलाहार कर सकते हैं या किसी अन्य व्यक्ति से व्रत का संकल्प करवा सकते हैं। वे केवल एक समय भोजन करके भी व्रत का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
निष्कर्ष
योगिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है। यह व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का एक शक्तिशाली साधन है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस एकादशी का पालन करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु सभी मनोरथ पूर्ण करने का वरदान देते हैं। इसीलिए इसे सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जो समस्त पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ योगिनी एकादशी का व्रत रखना चाहिए। यह व्रत न केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति भी कराता है। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!
आज का पंचांग 26 जुलाई 2026
शुभ मुहूर्त, चोघड़िया, राशिफल और ग्रह स्थिति की पूरी जानकारी के लिए
संबंधित लेख

भगवान जगन्नाथ का परिचय | इतिहास, पौराणिक कथा, स्वरूप एवं महत्व
भगवान जगन्नाथ भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप माने जाते हैं और ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर विश्वभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

हवन के दौरान हम "स्वाहा" क्यों कहते हैं? | Why Do we Say " Swaha" during havan?
स्वाहा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण मंत्र है, जो यज्ञ में आहुति की पूर्णता का प्रतीक है। यह देवी स्वधा का एक रूप है और पितरों को तृप्त करने व देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

काल भैरव और कुत्ते का संबंध | पौराणिक महत्व | काल भैरव और कुत्ते का संबंध | पौराणिक महत्व
कालभैरव का वाहन कुत्ता है, जो रक्षा और वफादारी का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में, भैरव को शिव का रौद्र रूप और काशी का कोतवाल कहा जाता है, जिनकी पूजा अनिष्ट निवारण और सुरक्षा के लिए की जाती है।

What is Mangal Dosha? | मंगल दोष क्या है?
हिंदू धर्म में मंगल दोष का गहन महत्व है, जो विवाह और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है। यह दोष ज्योतिषीय गणना पर आधारित है और इसके निवारण के उपाय भी बताए गए हैं।

श्री कार्तिकेय चालीसा | श्री कार्तिकेय चालीसा
श्री कार्तिकेय चालीसा का सम्पूर्ण पाठ, अर्थ सहित, पढ़ने के लाभ और महत्व को विस्तार से जानें। यह चालीसा भगवान कार्तिकेय की शक्ति, बुद्धि और विजय की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

Radha Chalisa | राधा चालीसा – संपूर्ण पाठ, अर्थ और लाभ 2026
राधा चालीसा – सम्पूर्ण पाठ, शब्दार्थ, विधि और लाभ। 2026 में राधा चालीसा हिंदी में पढ़ें।