त्योहार

Somvar Vrat | शिव पूजा, व्रत कथा और मनोकामना पूर्ति की विधि - 2026

Tilak Kathayein06 Apr 2026177 views📖 1 min read
सोमवार व्रत – Somvar Vrat Shiva
सोमवार व्रत भगवान शिव को समर्पित सबसे लोकप्रिय और फलदायी व्रतों में से एक है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने, शिवलिंग का अभिषेक करने और सोमवार व्रत कथा का श्रवण करने से मनोकामनाएं पूर्ण होने, वैवाहिक सुख, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होने की मान्यता है। इस लेख में जानें सोमवार व्रत की सम्पूर्ण कथा, पूजा विधि, व्रत नियम, उद्यापन, व्रत के लाभ और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का महत्व।

सोमवार व्रत – परिचय और महत्व

सोमवार व्रत प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष के सोमवार को रखा जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। 2026 में सोमवार व्रत जनवरी माह से प्रारंभ होंगे। यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने और मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए किया जाता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, सोमवार व्रत हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह व्रत भगवान शिव की आराधना का एक विशेष तरीका है और इसे अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह व्रत आत्मा को शुद्ध करता है और मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।

यह त्योहार अन्य त्योहारों से इस प्रकार विशेष है क्योंकि यह व्यक्तिगत भक्ति और श्रद्धा पर अधिक केंद्रित है। इसमें सामूहिक उत्सव की बजाय व्यक्तिगत साधना का महत्व है। यह व्रत सादगी और समर्पण का प्रतीक है।

पौराणिक कथा

प्राचीन समय में आनंदपुर नामक नगर में धनेश्वर नाम का एक अत्यंत समृद्ध व्यापारी रहता था। उसका व्यापार अनेक राज्यों तक फैला हुआ था और नगर के सभी लोग उसके सदाचार, दानशीलता तथा ईमानदारी के कारण उसका सम्मान करते थे। धन-वैभव, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उसके जीवन में एक बड़ा दुःख था। उसके घर संतान नहीं थी। यही चिंता उसे दिन-रात सताती रहती थी कि उसके बाद उसके विशाल व्यापार और परिवार की देखभाल कौन करेगा।

संतान प्राप्ति की कामना से धनेश्वर प्रत्येक सोमवार भगवान शिव का विधिपूर्वक व्रत रखता था। वह पूरे श्रद्धाभाव से शिवलिंग का जलाभिषेक करता, बेलपत्र अर्पित करता और सायंकाल नगर के प्राचीन महादेव मंदिर में जाकर शुद्ध घी का दीपक जलाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना करता था। उसकी अटूट भक्ति और समर्पण देखकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने भगवान शिव से उस भक्त व्यापारी की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध किया।

भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले, "देवि, इस संसार में प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त करता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही परिणाम मिलता है।"

किन्तु माता पार्वती उस व्यापारी की निष्काम भक्ति से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्होंने बार-बार भगवान शिव से निवेदन किया कि उस सच्चे भक्त पर कृपा अवश्य करें। अंततः माता के आग्रह को स्वीकार करते हुए भगवान शिव ने व्यापारी को पुत्र प्राप्ति का वरदान प्रदान कर दिया।

वरदान देते समय भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा, "आपके आग्रह पर मैं इसे पुत्र का सुख तो दे रहा हूँ, परन्तु इसका पुत्र केवल सोलह वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा।"

उसी रात्रि भगवान शिव व्यापारी के स्वप्न में प्रकट हुए। उन्होंने उसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया तथा यह भी बताया कि उसका पुत्र केवल सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा।

भगवान के वरदान से व्यापारी अत्यंत प्रसन्न हुआ, किन्तु पुत्र की अल्पायु का रहस्य जानकर उसका हृदय व्याकुल भी हो उठा। फिर भी उसने अपनी भक्ति और सोमवार के व्रत में कोई कमी नहीं आने दी। कुछ समय बाद उसके घर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। पूरे परिवार और नगर में आनंद का वातावरण छा गया तथा बड़े हर्षोल्लास के साथ जन्मोत्सव मनाया गया।

समय बीतता गया और बालक धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। जब उसकी आयु बारह वर्ष हुई, तब व्यापारी ने उसे उच्च शिक्षा के लिए अपने मामा के साथ काशीधाम भेजने का निर्णय लिया। मामा और भांजा यात्रा पर निकल पड़े। वे जहाँ भी विश्राम करते, वहाँ यज्ञ करते, ब्राह्मणों को भोजन कराते और दान-दक्षिणा देकर आगे बढ़ते।

कई दिनों की यात्रा के बाद वे सुवर्णपुर नामक नगर पहुँचे। उसी दिन वहाँ के राजा की राजकुमारी का विवाह था। पूरा नगर उत्सव की भव्य सजावट से सुसज्जित था। विवाह के लिए बारात आ चुकी थी, परंतु वर का पिता अत्यंत चिंतित था क्योंकि उसका पुत्र एक आँख से दृष्टिहीन था। उसे भय था कि यदि यह बात राजा को ज्ञात हो गई तो विवाह टूट जाएगा और पूरे राज्य में उसकी निंदा होगी।

इसी बीच उसकी दृष्टि व्यापारी के सुंदर और तेजस्वी पुत्र पर पड़ी। उसके मन में एक योजना आई। उसने सोचा कि यदि इस युवक को दूल्हे के रूप में विवाह मंडप में बैठा दिया जाए, तो विवाह बिना किसी बाधा के संपन्न हो जाएगा। बाद में इसे धन देकर विदा कर देंगे और राजकुमारी को अपने वास्तविक पुत्र के साथ भेज देंगे।

उसने यह प्रस्ताव लड़के के मामा के सामने रखा। धन के लालच में मामा ने उसकी बात स्वीकार कर ली। व्यापारी के पुत्र को दूल्हे का वेश पहनाकर राजकुमारी के साथ वैदिक रीति से विवाह संपन्न करा दिया गया। राजा ने अत्यंत प्रसन्न होकर कन्या को बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, रत्न और धन देकर विदा किया।

किन्तु व्यापारी का पुत्र सत्यनिष्ठ था। वह इस छल को स्वीकार नहीं कर सका। विदा होने से पहले उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया— "राजकुमारी, आपका वास्तविक विवाह मेरे साथ हुआ है। मैं तो शिक्षा प्राप्त करने काशी जा रहा हूँ। जिस युवक के साथ आपको भेजा जाएगा, वह एक आँख से दृष्टिहीन है।"

जब राजकुमारी ने यह संदेश पढ़ा तो उसने उस युवक के साथ जाने से स्पष्ट इनकार कर दिया। राजा को जब पूरी घटना का पता चला तो उसने अपनी पुत्री को महल में ही रहने दिया और उस छलपूर्ण विवाह को स्वीकार नहीं किया।

उधर व्यापारी का पुत्र अपने मामा के साथ काशीधाम पहुँच गया और गुरुकुल में अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। समय बीतता गया और जब उसकी आयु सोलह वर्ष हुई, तब उसने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ पूर्ण होने पर ब्राह्मणों को भोजन कराया, वस्त्र, अन्न और दक्षिणा का दान किया। रात्रि में वह विश्राम करने के लिए अपने कक्ष में चला गया। भगवान शिव के वरदान के अनुसार उसी रात्रि उसकी आयु पूर्ण हो गई और उसने प्राण त्याग दिए।

प्रातःकाल जब उसके मामा ने उसे मृत अवस्था में देखा तो वे विलाप करने लगे। आसपास के लोग भी वहाँ एकत्र हो गए और शोक प्रकट करने लगे।

उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ से अदृश्य रूप में गुजर रहे थे। माता पार्वती ने वह करुण विलाप सुना और भगवान शिव से कहा, "स्वामी, इस व्यक्ति का दुःख मुझसे देखा नहीं जा रहा। कृपया इसकी सहायता कीजिए।"

भगवान शिव ने समीप जाकर देखा और बोले, "देवि, यह वही व्यापारी का पुत्र है जिसे मैंने सोलह वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी निर्धारित आयु पूर्ण हो चुकी है।"

किन्तु माता पार्वती ने पुनः भगवान शिव से विनती की कि उस भक्त व्यापारी की भक्ति और सोमवार के व्रत का सम्मान करते हुए इस बालक को पुनः जीवन प्रदान करें। माता के प्रेमपूर्ण आग्रह से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस युवक को पुनर्जीवन का वरदान दिया। कुछ ही क्षणों में वह युवक जीवित होकर उठ बैठा।

शिक्षा पूर्ण होने के बाद युवक अपने मामा के साथ अपने नगर की ओर लौटने लगा। मार्ग में वे पुनः उसी सुवर्णपुर नगर पहुँचे जहाँ उसका विवाह हुआ था। वहाँ उन्होंने पुनः यज्ञ का आयोजन किया। नगर के राजा ने उन्हें देखा और तुरंत पहचान लिया।

यज्ञ समाप्त होने के पश्चात राजा उन्हें आदरपूर्वक महल ले गया। कुछ दिनों तक उनका भव्य आतिथ्य किया और फिर अपनी पुत्री का विधिवत विदा संस्कार कराकर उसे उसी युवक के साथ सम्मानपूर्वक भेज दिया। साथ ही उसने बहुमूल्य धन, वस्त्र, रत्न और अनेक उपहार भी प्रदान किए।

इधर व्यापारी और उसकी पत्नी अपने पुत्र की प्रतीक्षा में अत्यंत व्याकुल थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि यदि पुत्र की मृत्यु का समाचार मिलेगा तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे। तभी उन्हें समाचार मिला कि उनका पुत्र सकुशल वापस लौट रहा है। यह सुनते ही दोनों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे अपने परिवार और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर उसका स्वागत करने पहुँचे।

जब व्यापारी ने अपने पुत्र को जीवित देखा और उसके साथ राजकुमारी को बहू के रूप में पाया, तब उसका हृदय आनंद से भर गया। उसी रात्रि भगवान शिव पुनः उसके स्वप्न में प्रकट हुए और बोले, "हे श्रेष्ठ व्यापारी! तुम्हारी अटूट भक्ति, सोमवार के व्रत तथा श्रद्धापूर्वक व्रत कथा सुनने से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को दीर्घायु का आशीर्वाद प्रदान किया है।"

भगवान शिव के वचन सुनकर व्यापारी और उसका पूरा परिवार अत्यंत प्रसन्न हुआ। उन्होंने जीवनभर श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना और सोमवार व्रत का पालन किया।

जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से सोमवार का व्रत करते हैं, भगवान शिव की पूजा करते हैं तथा व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करते हैं, भगवान भोलेनाथ उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं, जीवन के संकट दूर करते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

पूजा विधि 2026

सोमवार व्रत की पूजा विधि में प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग की स्थापना की जाती है और उन्हें जल, दूध, दही, शहद, और घी से अभिषेक किया जाता है।

समयपूजा/रिवाजविशेषता
प्रातःकालस्नान और ध्यानसूर्य निकलने से पहले स्नान करें और भगवान शिव का ध्यान करें।
सुबह 9:00 बजेशिवलिंग अभिषेकदूध, दही, शहद और जल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
दोपहर 12:00 बजेआरती और मंत्र जापशिव आरती करें और 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करें।
शाम 6:00 बजेसंध्या आरतीसंध्याकाल में पुनः आरती करें और शिव चालीसा का पाठ करें।
रात्रि 8:00 बजेव्रत पारणभगवान को भोग लगाकर व्रत का पारण करें।

पूजा में 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। शिव आरती 'जय शिव ओंकारा' गाई जाती है, जो भगवान शिव की स्तुति में है।

प्रसाद और विशेष व्यंजन

  • खीर – खीर सोमवार व्रत में बनाई जाने वाली एक लोकप्रिय मिठाई है। इसे चावल, दूध और चीनी से बनाया जाता है और इसमें इलायची और केसर का स्वाद मिलाया जाता है।
  • सिंघाड़े का हलवा – यह हलवा सिंघाड़े के आटे, चीनी और घी से बनाया जाता है। यह व्रत के दौरान ऊर्जा प्रदान करता है और स्वादिष्ट भी होता है।
  • पंचामृत – यह दूध, दही, शहद, घी और चीनी से बना एक पारंपरिक भोग है। इसे भगवान शिव को अर्पित किया जाता है और फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

सोमवार व्रत पर फल, दूध, दही और साबूदाना खा सकते हैं। व्रत में अनाज, दालें और नमक का सेवन नहीं किया जाता है।

भारत में कैसे मनाते हैं

उत्तर भारत में सोमवार व्रत की परंपराएं बहुत प्रचलित हैं। यहाँ लोग भगवान शिव के मंदिरों में दर्शन करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। इस दिन विशेष रूप से रुद्राभिषेक किया जाता है।

पश्चिम, दक्षिण और पूर्व भारत में भी सोमवार व्रत को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। हर क्षेत्र में अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार व्रत का पालन किया जाता है।

सोमवार व्रत पर घरों को फूलों और तोरणों से सजाया जाता है। महिलाएं हरे और पीले रंग के वस्त्र पहनती हैं, जो शुभ माने जाते हैं। इस दिन भगवान शिव के लोकगीत गाए जाते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

तैयारी और सजावट

सोमवार व्रत से पहले घर की साफ-सफाई की जाती है और भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग को स्थापित करने के लिए एक पवित्र स्थान बनाया जाता है। व्रत से एक-दो दिन पहले ही पूजा सामग्री और आवश्यक वस्तुएं खरीद ली जाती हैं।

पारंपरिक सजावट में रंगोली बनाना, दीप जलाना और फूलों से सजावट करना शामिल है। आधुनिक सजावट में बिजली की लड़ियों और भगवान शिव की तस्वीरों का उपयोग किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में सोमवार व्रत कब है?

2026 में सोमवार व्रत की शुरुआत जनवरी के पहले सोमवार से होगी। प्रत्येक सोमवार को यह व्रत रखा जाएगा। शुभ मुहूर्त सुबह सूर्योदय के समय होता है।

सोमवार व्रत पर क्या दान करना चाहिए?

सोमवार व्रत पर गरीबों को अन्न और वस्त्र दान करना चाहिए। शिव मंदिर में घी और तेल का दान करना भी शुभ माना जाता है।

सोमवार व्रत का व्रत कौन रख सकता है?

सोमवार व्रत कोई भी रख सकता है जो भगवान शिव में श्रद्धा रखता है। महिलाएं, पुरुष और बच्चे सभी इस व्रत का पालन कर सकते हैं।

निष्कर्ष

सोमवार व्रत आधुनिक हिंदू जीवन में गहरी आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह पारिवारिक बंधनों को मजबूत करता है, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है, और भगवान शिव के प्रति भक्ति को गहरा करता है। यह व्रत हमें सादगी, त्याग और समर्पण का महत्व सिखाता है।

सोमवार व्रत का पालन करने वाले सभी भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएं। शुभ सोमवार व्रत!

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आज का पंचांग 25 अगस्त 2026

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