शिव पार्वती विवाह कथा – अध्याय 6: विवाह प्रस्ताव और स्वीकृति | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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शिव पार्वती विवाह कथा – अध्याय 6: विवाह प्रस्ताव और स्वीकृति

Tilak Kathayein12 Apr 202670 views📖 1 min read
शिव पार्वती विवाह कथा
शिव पार्वती विवाह कथा का अध्याय 6 — विवाह प्रस्ताव और स्वीकृति। सप्तऋषि हिमवान के पास शिव का विवाह प्रस्ताव लेकर जाते हैं और पार्वती के माता-पिता इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं।

विवाह प्रस्ताव और स्वीकृति

कामदेव के भस्म होने के बाद, वातावरण में एक अजीब सन्नाटा छा गया था। रति का विलाप पूरे ब्रह्मांड में गूंज रहा था, लेकिन शिव अपनी तपस्या में लीन थे। हिमालय की शांति भंग हो चुकी थी, परन्तु देवताओं को अब एक आशा की किरण दिखाई दे रही थी - शिव और पार्वती का विवाह ही अब एकमात्र उपाय था।

सप्तऋषि का आगमन

एक शुभ दिन, हिमालय के शिखर पर सात दिव्य ऋषि प्रकट हुए। उनके तेज से पर्वत प्रकाशित हो उठा। ऋषिगण, ब्रह्मा के मानस पुत्र, अद्भुत ज्ञान और तपस्या के प्रतीक थे। उनकी उपस्थिति ने हिमवान और मैना के हृदय में श्रद्धा भर दी। वे समझ गए कि ये कोई साधारण आगमन नहीं है; यह किसी महान उद्देश्य का संकेत है। हवा में एक पवित्र सुगन्ध फैल गयी, और पक्षी शांत हो कर ऋषियों का सम्मान करने लगे। हिमवान और मैना ने दौड़कर ऋषियों के चरण छुए और उन्हें आदर सहित आसन पर बैठाया।

हिमवान ने विनम्रता से पूछा, "हे ऋषिवर्य, हमारे इस निर्जन पर्वत पर आपका आगमन किस कारण से हुआ? हम आपके चरणों की धूलि पाकर धन्य हो गए। कृपया हमें बताएं कि हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं।" उनके मन में थोड़ा भय भी था कि कहीं उनकी कोई भूल तो नहीं हुई, जिसके कारण इतने महान ऋषि उनके द्वार पर आये हैं। मैना भी उत्सुकता से ऋषियों की ओर देख रही थी।

विवाह प्रस्ताव

सप्तऋषियों में से एक, ऋषि वशिष्ठ ने अपनी शांत वाणी में कहा, "हे हिमवान, हम भगवान शिव की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव लेकर आए हैं। तुम्हारी पुत्री पार्वती ने अपनी तपस्या और भक्ति से शिव को प्रसन्न किया है। अब शिव उनसे विवाह करना चाहते हैं।" यह सुनते ही हिमवान और मैना आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें अपनी कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। क्या सच में भगवान शिव उनकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं? यह तो उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य था।

ऋषि ने आगे कहा, "पार्वती में आदि शक्ति के लक्षण हैं, और शिव उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाना चाहते हैं। यह विवाह केवल हिमवान के परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के लिए कल्याणकारी होगा। यह सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक है।" शिव की इच्छा सुनकर, हिमवान और मैना भाव विभोर हो उठे। शिव की कृपा से बढ़कर उनके लिए और क्या हो सकता था?

हिमवान और मैना की स्वीकृति

हिमवान ने हाथ जोड़कर कहा, "हे ऋषिवर्य, यह हमारे लिए परम सौभाग्य है। भगवान शिव स्वयं हमारी पुत्री का हाथ थामना चाहते हैं, इससे बढ़कर हमारे लिए क्या हो सकता है? हम इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार करते हैं।" मैना की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने अपनी पुत्री को गोद में लेकर प्यार किया। उनकी पार्वती सचमुच में धन्य थी।

मैना ने कहा, "परन्तु, क्या हमारी पार्वती उस महान योगी के योग्य है? क्या वह उनकी तपस्या और वैराग्य के जीवन में सहयोग दे पाएगी? मेरा मातृत्व हृदय थोड़ा चिंतित है, ऋषिवर्य।" ऋषि वशिष्ठ ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैना देवी, चिंता न करें। पार्वती आदि शक्ति का रूप है। वह शिव की शक्ति है, उनकी प्रेरणा है। वह निश्चित रूप से शिव के साथ जीवन के हर मार्ग पर चल पाएगी। यह मिलन तो नियति ने ही तय किया है।" शिव के नाम मात्र से ही उनके सारे भय दूर हो गए। यह एक दिव्य संकेत था, सबकुछ भगवान शिव की इच्छा से ही हो रहा था। अब उन्हें इस विवाह के सफल होने में कोई संदेह नहीं था। विवाह की स्वीकृति के साथ ही हिमालय में उत्सव का माहौल छा गया।

अध्याय 6 का सार: सप्तऋषि विवाह प्रस्ताव लेकर हिमवान के पास आए, जिसे उन्होंने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति और तपस्या से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है, और उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। शिव और पार्वती का विवाह ब्रह्मांड के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।

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