एकादशी व्रत कथा

Shattila Ekadashi | षट्तिला एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

Tilak Kathayein19 May 2026121 views📖 1 min read
षट्तिला एकादशी – Shattila Ekadashi
षट्तिला एकादशी 2026 – व्रत कथा, विधि, क्या खाएं, शुभ मुहूर्त और लाभ। भगवान विष्णु की कृपा पाएं।

षट्तिला एकादशी – परिचय

षट्तिला एकादशी, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। 2026 में, यह एकादशी 4 फरवरी को पड़ेगी। इस एकादशी का नाम 'षट्तिला' इसलिए है क्योंकि इसमें छह प्रकार की तिलों (तिल स्नान, तिल दान, तिल होम, तिल अर्पण, तिल भोज, तिल स्तोत्र) का विधान है। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है और सभी एकादशियों में इसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह समस्त पापों का नाश कर मोक्ष प्रदान करती है।

सभी एकादशियों में षट्तिला एकादशी का विशेष स्थान है। इसे 'तिला एकादशी' या 'महा एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसमें तिल का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है, जो भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।

षट्तिला एकादशी की व्रत कथा

प्राचीन काल में एक तपस्वी ब्राह्मण था, जो अत्यंत ज्ञानी और ईश्वर भक्त था। वह भगवद् भजन में लीन रहता था, परंतु उसने कभी भी किसी अतिथि का सत्कार नहीं किया और न ही किसी को अन्न दान दिया। एक बार वह जब अपनी कुटिया में लौटा तो उसने देखा कि एक दरिद्र कन्या वहां खड़ी है, जिसने अत्यंत दीनता से उससे भोजन माँगा। ब्राह्मण ने उसे कुछ भी नहीं दिया, केवल थोड़ी सी मिट्टी दे दी।

कुछ समय पश्चात, उस कन्या ने उस मिट्टी को अपने घर ले जाकर विधि-विधान से उसका लेप किया और भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो गई। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। कन्या ने अपने पूर्व जन्म के कष्टों का वर्णन करते हुए प्रभु से प्रार्थना की कि उसे इस जन्म में वह सब मिले जो उसने पिछले जन्म में नहीं किया था। भगवान ने प्रसन्न होकर उसे सुखी जीवन का वरदान दिया।

जब कन्या का विवाह हुआ, तो वह अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। कुछ समय बाद, उसके पति की मृत्यु हो गई। वह फिर से भगवान विष्णु की शरण में गई। भगवान ने उसे षट्तिला एकादशी का व्रत रखने का विधान बताया। उसने विधि-विधान से षट्तिला एकादशी का व्रत किया, जिसमें छह प्रकार के तिलों का प्रयोग किया। इस व्रत के प्रभाव से वह अपने पति के साथ स्वर्ग लोक को प्राप्त हुई।

व्रत विधि

दशमी की रात को व्रती को सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। देर रात तक जागना चाहिए और भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजा करें। तुलसी दल, पुष्प, फल आदि अर्पित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का यथाशक्ति जाप करें।

समयकरने का कार्य
प्रातःकालसूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें, व्रत का संकल्प लें।
सुबहभगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की पूजा करें, तुलसी दल एवं पुष्प अर्पित करें।
दिन भर'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें, कथा का श्रवण करें, तिल का दान करें।
सायंकालसंध्या आरती करें, भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें।
रात्रिफलाहार करें (यदि संभव हो तो निर्जल रहें), भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।

द्वादशी के दिन, सूर्योदय के पश्चात स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों को भोजन कराएं या दान दें। इसके पश्चात स्वयं फलाहार ग्रहण कर व्रत का पारण करें। पारण के समय किसी भी अन्न का सेवन किया जा सकता है।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

षट्तिला एकादशी व्रत में फल, दूध, दही, घी, मेवे, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और साबूदाना आदि खा सकते हैं। भगवान विष्णु को अर्पित किए गए प्रसाद का सेवन भी कर सकते हैं। तिल से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, तिल के पकवान आदि का सेवन विशेष रूप से शुभ होता है।

इस व्रत में चावल खाना वर्जित है। इसके अतिरिक्त, मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और अन्य तामसिक भोजन का सेवन भी नहीं करना चाहिए। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि माना जाता है कि चावल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के अंश से हुई है, इसलिए एकादशी के दिन इसका सेवन करने से वे अप्रसन्न हो सकते हैं।

षट्तिला एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत से समस्त प्रकार के पापों का नाश होता है। पुराणों के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के पिछले जन्मों के भी पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति – षट्तिला एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और वह बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।
  • सांसारिक लाभ – इस व्रत के प्रभाव से धन, संपत्ति, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। घर में सुख-शांति बनी रहती है।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर शुद्ध होता है और रोगों से मुक्ति मिलती है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में षट्तिला एकादशी कब है?

2026 में षट्तिला एकादशी 4 फरवरी, मंगलवार को मनाई जाएगी। इसका शुभ मुहूर्त 4 फरवरी की सुबह 02:44 से प्रारंभ होकर 5 फरवरी की सुबह 04:31 तक रहेगा।

षट्तिला एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चावल को अन्न की देवी 'श्री' का रूप माना जाता है, जो भगवान विष्णु से अभिन्न रूप से जुड़ी हैं। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस दिन चावल का सेवन करने से वे अप्रसन्न हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ कथाओं में चावल को चंद्रमा का अंश भी माना जाता है, और एकादशी के दिन चंद्रमा का सेवन वर्जित बताया गया है।

क्या बीमार व्यक्ति षट्तिला एकादशी व्रत रख सकता है?

हाँ, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं या वृद्धजन यदि पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, तो वे फलाहार कर सकते हैं या केवल एक समय भोजन कर सकते हैं। वे किसी योग्य पंडित से सलाह लेकर व्रत का विधान जान सकते हैं।

निष्कर्ष

षट्तिला एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है, क्योंकि भगवान विष्णु अपने सच्चे भक्तों को इस व्रत के माध्यम से समस्त सुख-समृद्धि और अंत में मोक्ष का वरदान देते हैं। यही कारण है कि इसे सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, विशेषकर तिल के प्रयोग से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।

सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ षट्तिला एकादशी का व्रत रखना चाहिए। इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

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आज का पंचांग 29 जुलाई 2026

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