Purushottam Maas Katha: Adhyaya 4 | पुरुषोत्तम मास कथा: अध् | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा

Purushottam Maas Katha: Adhyaya 4 | पुरुषोत्तम मास कथा: अध्याय 4 |

Tilak Kathayein12 Jan 2025182 views📖 1 min read
Purushottam Maas Katha: Adhyaya 4 | पुरुषोत्तम मास कथा: अध्याय 4 |
अधिमास, शरणागत होकर भगवान विष्णु से अपने तिरस्कार और कष्ट की व्यथा कहता है। करुणा से द्रवित भगवान विष्णु अधिमास को स्वीकारते हैं और उसे आश्वासन देते हैं। श्रीनारायण बोले, …

अधिमास, शरणागत होकर भगवान विष्णु से अपने तिरस्कार और कष्ट की व्यथा कहता है। करुणा से द्रवित भगवान विष्णु अधिमास को स्वीकारते हैं और उसे आश्वासन देते हैं।

श्रीनारायण बोले, ‘हे नारद! भगवान् पुरुषोत्तम के आगे जो शुभ वचन अधिमास ने कहे वह लोगों के कल्याण की इच्छा से हम कहते हैं, सुनो।

अधिमास बोला, ‘हे नाथ! हे कृपानिधे! हे हरे! मेरे से जो बलवान् हैं उन्होंने ‘यह मलमास है’ ऐसा कहकर मुझ दीन को अपनी श्रेणी से निकाल दिया है ऐसे यहाँ आये हुए मेरी आप रक्षा क्यों नहीं करते? अपने स्वामी देवता वाले मासादिकों द्वारा शुभ कर्म में वर्जित मुझ स्वामिरहित को देखते ही आपकी दयालुता कहाँ चली गयी और आज यह कठोरता कैसे आ गयी

हे भगवन्! कंसरूप अग्नि से जलती हुई वसुदेव की स्त्री (देवकी) की रक्षा जैसे आपने की वैसे ही, हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते

पहले द्रुपद राजा की कन्या द्रौपदी की दुःशासन के दुःख से जैसे आपने रक्षा की वैसे हे दीनदयाला! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते?

यमुना में कालिय नाग के विष से गौ चराने वालों तथा पशुओं की आपने जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते?

पशु और पशुओं को पालने वालों एवं पशुपालकों की स्त्रियों की जैसे पहले व्रज में सर्पत के वन में लगी हुई अग्नि से आपने रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते।

मगध देश के राजा जरासंध के बन्धन से राजाओं की जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आप कैसे रक्षा नहीं करते।

आपने ग्राह के मुख से गजराज की झट आकर जैसे रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये की आज कैसे रक्षा नहीं करते।’

श्रीनारायण बोले, ‘इस प्रकार भगवान्‌ को कह स्वामी रहित मलमास, आँसू बहता मुख लिये जगत्पति के सामने चुपचाप खड़ा रहा। उसको रोते देखते ही भगवान् शीघ्र ही दयार्द्र हो गये और पास में खड़े दीनमुख मलमास से बोले।

श्रीहरि बोले, ‘हे वत्स! क्यों इस समय अत्यन्त दुःख में डूबे हुए हो ऐसा कौन बड़ा भारी दुःख तुम्हारे मन में है? दुःख में डूबते हुए तुझको हम बचायेंगे, तुम शोक मत करो। मेरी शरण में आया फिर शोक करने के योग्य नहीं रहता है। यहाँ आकर महादुःखी नीच भी शोक नहीं करता किसलिये तुम यहाँ आकर शोक में मन को दबाये हुए हो।

जहाँ आने से न शोक होता है, न कभी बुढ़ौती आती है, न मृत्यु का भय रहता है, किन्तु नित्य आनन्द रहा करता है इस प्रकार के बैकुण्ठ में आकर तुम कैसे दुःखित हो? तुमको यहाँ पर दुःखित देखकर वैकुण्ठवासी बड़े विस्मय को प्राप्त हो रहे हैं, हे वत्स! तुम कहो इस समय तुम मरने की क्यों इच्छा करते हो?’

श्रीनारायण बोले, ‘इस प्रकार भगवान् के वाक्य सुनकर बोझा लिये हुए आदमी जैसे बोझा रख कर श्वास पर श्वास लेता है इसी प्रकार श्वासोच्छ्‌वास लेकर अधिमास मधुसूदन से बोला।

अधिमास बोला, ‘हे भगवन्! आप सर्वव्यापी हैं, आप से अज्ञात कुछ नहीं है, आकाश की तरह आप विश्व में व्याप्त होकर बैठे हैं। चर-अचर में व्याप्त विष्णु आप सब के साक्षी हैं, विश्व भर को देखते हैं, विषय की सन्निधि ने भी विकार शून्य आप में शास्त्रमर्यादा के अनुसार सब भूत स्थित हैं। हे जगन्नाथ! आप के बिना कुछ भी नहीं है। क्या आप मुझ अभागे के कष्ट को नहीं जानते हैं?

तथापि हे नाथ! मैं अपनी व्यथा को कहता हूँ जिस प्रकार मैं दुःखजाल से घिरा हुआ हूँ वैसे दुःखित को मैंने न कहीं देखा है और न सुना है। क्षण, निमेष, मुहूर्त, पक्ष, मास, दिन और रात सब अपने-अपने स्वामियों के अधिकारों से सर्वदा बिना भय के प्रसन्न रहते हैं। मेरा न कुछ नाम है, न मेरा कोई अधिपति है और न कोई मुझको आश्रय है अतः क्षणादिक समस्त स्वामी वाले देवों ने शुभ कार्य से मेरा निरादर किया है।

यह मलमास सर्वदा त्याज्य है, अन्धा है, गर्त में गिरने वाला है ऐसा सब कहते हैं। इसी के कारण से मैं मरने की इच्छा करता हूँ अब जीने की इच्छा नहीं है। निन्द्य जीवन से तो मरना ही उत्तम है। जो सदा जला करता है वह किस तरह सो सकता है, हे महाराज! इससे अधिक मुझको और कुछ कहना नहीं है।

वेदों में आपकी इस तरह प्रसिद्धि है कि पुरुषोत्तम आप परोपकार प्रिय हैं और दूसरों के दुःख को सहन नहीं करते हैं। अब आप अपना धर्म समझकर जैसी इच्छा हो वैसा करें। आप प्रभु और महान् हैं, आपके सामने मुझ जैसे पामर को घड़ी-घड़ी कुछ कहते रहना उचित नहीं है। मैं मरूँगा, मैं मरूँगा, मैं अब न जीऊँगा, ऐसा पुनः पुनः कहकर वह अधिमास, हे ब्रह्मा के पुत्र! चुप हो गया। और एकाएक श्रीविष्णु के निकट गिर गया। तब इस प्रकार गिरते हुए मलमास को देख भगवान् की सभा के लोग बड़े विस्मय को प्राप्त हुए।’

श्रीनारायण बोले, ‘इस प्रकार कहकर चुप हुए अधिमास के प्रति बहुत कृपा-भार से अवसन्न हुए श्रीकृष्ण, मेघ के समान गम्भीर वाणी से चन्द्रमा की किरणों की तरह उसे शान्त करते हुए बोले।’

सूतजी बोले, ‘हे विप्रो! वेदरूप ऋद्धि के आश्रित नारायण का पापों के समूहरूप समुद्र को शोषण करने वाला बड़वानल अग्नि से समान वचन सुनकर प्रसन्न हुए नारदमुनि, पुनः आदिपुरुष के वचनों को सुनने की इच्छा से बोले।

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः ॥4॥

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