Purushottam Maas Katha: Adhyaya 11 | पुरुषोत्तम मास कथा: अध | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा

Purushottam Maas Katha: Adhyaya 11 | पुरुषोत्तम मास कथा: अध्याय 11

Tilak Kathayein12 Jan 2025308 views📖 1 min read
Purushottam Maas Katha: Adhyaya 11 |  पुरुषोत्तम मास कथा: अध्याय 11
कथा में एक तपस्विनी कन्या ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी ने उसे पाँच पति का वर दिया, लेकिन कन्या ने इसे अस्वीकार कर दिया, और पुरुषोत्तम मास…

कथा में एक तपस्विनी कन्या ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी ने उसे पाँच पति का वर दिया, लेकिन कन्या ने इसे अस्वीकार कर दिया, और पुरुषोत्तम मास का अपमान करने का परिणाम बताया।

नारदजी बोले – सब मुनियों को भी जो दुष्कर कर्म है ऐसा बड़ा भारी तप जो इस कुमारी ने किया वह हे महामुने! हमें सुनाइये।

श्रीनारायण बोले – अनन्तर ऋषि-कन्या ने भगवान्‌ शिव, शान्त, पंचमुख, सनातन महादेव को चिन्तन करके परम दारुण तप आरम्भ किया। सर्पों का आभूषण पहिने, देव, नन्दी-भृंगी आदि गणों से सेवित, चौबीस तत्त्वों और तीनों गुणों से युक्त, अष्ट महासिद्धियों तथा प्रकृति और पुरुष से युक्त, अर्धचन्द्र से सुशोभित मस्तकवाले, जटा-जूट से विराजित भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ उस बाला ने परम तप आरम्भ किया।

ग्रीष्म ऋतु के सूर्य होने पर पंचाग्नि के बीच में बैठकर, हेमन्त और शिशिर ऋतुओं में ठण्डे जल में बैठकर, खुले हुए मुखवाली जल में खिले हुए कमल की तरह शोभित होने लगी। सिर के नीचे फैली हुई काली और नीली अलकों से ढँकी हुई वह जल में ऐसी मालूम होने लगी जैसे कीचड़ की लता सेवारों के समूह से घिरी हुई हो।

शीत के कारण नासिका से निकलती हुई शोभित धूम्‌राशि इस तरह दिखाई देने लगी जैसे कमल से मकरन्द पार करके भ्रमरपंक्ति जा रही हो। वर्षाकाल में आसन से युक्त चौतरे पर बिना छाया के सोती थी और वह सुन्दर अंगवाली प्रातः-सायं धूमपान करके रहती थी। उस कन्या के इस प्रकार के कठिन तप को सुन कर इन्द्र बहुत चिन्तित हो गये

सब देवताओं से दुधुर्षा और ऋषियों से स्पृहणीया। उस ऋषि-कन्या के तप में लगे रहने पर हे नृपनन्दन! हे क्षत्रिय भूषण! नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गये। उस बाला के तप से भगवान्‌ शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अपना इन्द्रियातीत निज स्वरूप दिखलाया। भगवान्‌ शंकर को देखकर देह में जैसे प्राण आ जाय वैसे सहसा खड़ी हो गई और तप से दुर्बल होने पर भी वह बाला उस समय हृष्टपुष्ट हो गयी। बहुत वायु और घाम से क्लेश पाई हुई वह शंकर को बहुत अच्छी लगी और उस कन्या ने झुककर पार्वतीपति शंकरजी को प्रणाम किया। उन विश्वोवन्दित भगवान्‌ का मानसिक उपचारों से पूजन करके और भक्तियुक्त चित्त से जगत्‌ के नाथ की स्तुति करने लगी।

कन्या बोली – हे पार्वतीप्रिय! हे प्राणनाथ! हे प्रभो! हे भर्ग! हे भूतेश! हे गौरीश! हे शम्भो! हे सोमसूर्याग्निनेत्र! हे तमः! हे मेरे आधार! मुण्डास्थिमालिन्‌! आपको प्रणाम है।

अनेक तापों से व्याप्त है अंगों में पीड़ा जिसके ऐसा, तथा परम घोर संसाररूपी समुद्र में डूबा हुआ, दुष्ट सर्पों तथा काल के तीक्ष्ण दांतों से डँसा हुआ मनुष्य भी यदि आपकी शरण में आ जाए तो मुक्त हो जाता है।

हे विभो! जिन आपने बाणासुर को अपनाया और मरी हुई अलर्क राजा की पत्नी को जिलाया ऐसे आप हे दयानाथ! भूतेश! चण्डीिश! भव्य! भवत्राण! मृत्युञ्जय! प्राणनाथ! हे दक्षप्रजापति के मुख को ध्वंस करने वाले! हे समस्त शत्रुओं के नाशक! हे सदा भक्तों को संसार से छुड़ाने वाले! हे जन्म के हर्ता, हे प्रथम सृष्टि के कर्ता! हे प्राणनाथ! हे पाप के नाश करने वाले! आप को नमस्कार है। अपने सेवकों की रक्षा कीजिये।

हे नृप! बड़ी भाग्यवती मेधावी की तपस्विनी कन्या इस प्रकार मन से और वाणी से शंकर की स्तुति करके चुप हो गयी।

श्रीकृष्ण बोले – कन्या द्वारा की हुई स्तुति सुनकर और उसके किये हुए उग्रतप से प्रसन्न मुखकमल

सदाशिव कन्या से बोले – हे तपस्विनि! तेरा कल्याण हो, तेरे मन में जो अभीष्ट हो वह वर तू माँग, हे महाभागे! मैं प्रसन्न हूँ, तू खेद मत कर।
ऐसा भगवान्‌ शंकर का वचन सुन वह कुमारी अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुई और हे राजन्‌! प्रसन्न हुए सदाशिव से बोली

कन्या बोली – हे दीनानाथ! हे दयासिन्धो! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो हे प्रभो! मेरी कामना पूर्ण करने में देर न करें। हे महादेव! मुझको पति दीजिये, पति दीजिये, पति दीजिये, मैं पति चाहती हूँ, पति दीजिये, मैंने हृदय में और कुछ नहीं सोचा है।
वह ऋषिकन्या इस प्रकार महादेव से कह कर चुप हो गयी तब यह सुन कर महादेव जी उससे बोले।

शिव बोले – हे मुनिकन्यके! तूने जैसा अपने मुख से कहा है वैसा ही होगा क्योंकि तूने पाँच बार पति माँगा है, अतः हे सुन्दरी! तेरे पाँच पति होंगे और वे पाँचों वीर, सर्वधर्मवेत्ता, सज्जन, सत्यपराक्रमी, यज्ञ करनेवाले, अपने गुणों से प्रसिद्ध, सत्य प्रसिद्ध जितेन्द्रिय, तेरा मुख देखने वाले, सभी क्षत्रीय और गुणवान्‌ होंगे।’

श्रीकृष्ण बोले – न तो अधिक प्रिय, न तो अधिक अप्रिय ऐसे महादेव के वचन को सुनकर, बोलने में चतुरा कन्या झुककर बोली।

बाला बोली – हे गिरिजाकान्त! सदाशिव! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, अतः पाँच पति का वर देकर, लोक में मेरी हँसी न कराइये। एक स्त्री पाँच पतिवाली न देखी गयी है और न सुनी गयी है। हाँ, एक पुरुष की पाँच स्त्रियाँ तो हो सकती हैं।

हे शम्भो हे कृपानिधे! आपकी सेविका मैं पाँच पतियों वाली कैसे हो सकती हूँ आपको मेरे लिये ऐसा कहना उचित नहीं है। आपकी सेविका होने के कारण जो लज्जा मुझे हो रही है, वह आप अपने को ही समझिये। कन्या का यह वचन सुनकर शंकरजी पुनः उससे बोले।

शंकरजी बोले – हे भीरु! इस जन्म में तुझे पति सुख नहीं मिलेगा, दूसरे जन्म में जब तू तपोबल से बिना योनि के उत्पन्न होगी। तब पति सुख को भोग कर अनन्तर परमपद को प्राप्त होगी क्योंकि मेरी प्रिय मूर्ति दुर्वासा का तूने पहले अपमान किया है।

हे सुभ्रु! वह दुर्वासा यदि क्रोध करें तो तीनों भुवनों को जला सकते हैं सो तूने अभिमान वश ब्रह्मतेज का मर्दन किया है। जिस अधिमास को भगवान्‌ कृष्ण ने अपना ऐश्वर्य दे दिया उस भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तममास का व्रत तूने नहीं किया।

मैं ब्रह्मा आदि से लेकर सब देवता, नारद आदि से लेकर सब तपस्वी, जिसकी आज्ञा सदा मानते चले आये हैं, हे बाले! उसकी आज्ञा का कौन उलंघन करता है? लोकपूजित पुरुषोत्तम मास की दुर्वासा की आज्ञा से तूने पूजा नहीं की हे मूढ़े! द्विजात्मजे! इसी लिये तेरे पाँच पति होंगे।

हे बाले! पुरुषोत्तम के अनादर करने से अब अन्यथा नहीं हो सकता है। जो उस पुरुषोत्तम की निन्दा करता है वह रौरव नरक का भागी होता है। पुरुषोत्तम का अपमान करने वाले को विपरीत ही फल होता है, यह बात कभी अन्यथा नहीं हो सकती है। पुरुषोत्तम के जो भक्त हैं वे पुत्र, पौत्र और धनवाले होते हैं, और वे इस लोक को तथा परलोक की सिद्धि को प्राप्त हुए हैं, प्राप्त होंगे और प्राप्त हो रहे हैं। और हम सब देवता लोग भी पुरुषोत्तम की सेवा करने वाले हैं

जिस पुरुषोत्तम मास में व्रतादिक से पुरुषोत्तम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं उस सेवा करने योग्य मास को हे सुमध्यमे! हम लोग कैसे न भजें? उचित और अनुचित विचार की चर्चा करने वाले अतएव अनुकरणीय जो मुनि हैं उन अति उत्कट श्रेष्ठ तपस्वी पुरुषों का वचन कैसे मिथ्या हो सकता है? कहो
इस प्रकार कथन करते हुए भगवान्‌ नीलकण्ठ शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये और वह बाला यूथ से भ्रष्ट मृगी की तरह चकित सी हो गयी।

सूतजी बोले – हे मुनीश! रेखासदृश चन्द्रमा से युक्त मस्तकवाले सदाशिव जब उत्तर दिशा के प्रति चले गये तब वृत्रासुर को मारकर जैसे इन्द्र को चिन्ता हुई थी उसी प्रकार मुनिराज की कन्या को चिन्ता बाधा करने लगी।

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥

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