महाभारत युद्ध का इतिहास: कारण, 18 दिनों का युद्ध, प्रमुख योद्धा, श्रीकृष्ण की भूमिका और महाभारत से मिलने वाली शिक्षाएँ

महाभारत युद्ध का इतिहास : कुरु वंश, पांडव-कौरव, द्यूत क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण और युद्ध की भूमिका
महाभारत केवल भारत का सबसे महान महाकाव्य नहीं है, बल्कि धर्म, नीति, न्याय, राजनीति, कर्तव्य और मानव जीवन के गहन सिद्धांतों का अमूल्य ग्रंथ भी है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में लगभग एक लाख से अधिक श्लोक हैं, इसलिए इसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है।
महाभारत का युद्ध केवल दो राजवंशों के बीच सत्ता प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच निर्णायक युद्ध था। इस युद्ध ने न केवल हस्तिनापुर का भविष्य बदला, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता को जीवन का ऐसा ज्ञान दिया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इस लेख के प्रथम भाग में हम महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि, कुरु वंश का इतिहास, पांडवों और कौरवों का जन्म, दुर्योधन का षड्यंत्र, द्यूत क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण, वनवास और युद्ध की घोषणा तक की सम्पूर्ण कथा विस्तार से जानेंगे।
महाभारत का परिचय
महाभारत का मूल नाम "जय" था, जिसे बाद में "भारत" और अंततः "महाभारत" कहा गया। यह ग्रंथ केवल युद्ध का वर्णन नहीं करता, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र—राजनीति, समाज, परिवार, धर्म, अर्थ, शिक्षा, युद्धनीति और आध्यात्मिकता—का अद्भुत ज्ञान प्रदान करता है।
महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ की रचना की और भगवान श्रीगणेश ने इसे लिखा। मान्यता है कि श्रीगणेश ने एक शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे और वेदव्यास ने कहा कि वे प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझकर ही लिखें। इसी कारण महाभारत में अनेक गूढ़ और दार्शनिक श्लोक मिलते हैं।
महाभारत की कथा की शुरुआत कुरु वंश से होती है। यह वंश अपनी वीरता, धर्मपालन और विशाल साम्राज्य के लिए प्रसिद्ध था। हस्तिनापुर इसकी राजधानी थी और यही आगे चलकर महाभारत युद्ध का केंद्र बना।
कुरु वंश के महान राजा शांतनु थे। वे न्यायप्रिय और प्रजावत्सल शासक माने जाते थे।
राजा शांतनु और गंगा
राजा शांतनु का विवाह देवी गंगा से हुआ। विवाह से पूर्व गंगा ने एक शर्त रखी कि राजा कभी भी उनके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
गंगा ने सात पुत्रों को जन्म लेते ही नदी में प्रवाहित कर दिया। जब आठवें पुत्र को भी नदी में प्रवाहित करने लगीं, तब राजा शांतनु स्वयं को रोक नहीं पाए और उन्होंने उन्हें रोक दिया।
शर्त टूटने पर गंगा उस बालक को लेकर चली गईं। यही बालक आगे चलकर देवव्रत कहलाया, जिन्हें संसार भीष्म पितामह के नाम से जानता है।
भीष्म प्रतिज्ञा
कुछ वर्षों बाद राजा शांतनु का हृदय मछुआरे की पुत्री सत्यवती पर आ गया। सत्यवती के पिता चाहते थे कि उनके पुत्र ही हस्तिनापुर के राजा बनें।
अपने पिता के सुख के लिए देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य और सिंहासन का त्याग करने की भीषण प्रतिज्ञा ली।
उनकी इस कठिन प्रतिज्ञा से देवताओं ने उन्हें "भीष्म" नाम दिया। यह भारतीय इतिहास की सबसे महान त्याग कथाओं में से एक मानी जाती है।
विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म
राजा शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए—चित्रांगद और विचित्रवीर्य। दोनों की असमय मृत्यु के बाद वंश संकट उत्पन्न हो गया।
सत्यवती के आग्रह पर महर्षि वेदव्यास ने नियोग परंपरा के अनुसार विचित्रवीर्य की रानियों से संतान उत्पन्न की।
- धृतराष्ट्र – जन्म से नेत्रहीन।
- पांडु – स्वस्थ एवं पराक्रमी।
- विदुर – अत्यंत बुद्धिमान और धर्मज्ञ।
धृतराष्ट्र अंधे होने के कारण पांडु हस्तिनापुर के राजा बने।
पांडु का श्राप
वन में शिकार करते समय राजा पांडु ने भूलवश एक ऋषि और उनकी पत्नी को मृग समझकर बाण मार दिया। मरते समय ऋषि ने उन्हें श्राप दिया कि यदि वे अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाएँगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।
इस कारण पांडु ने वन में रहकर तपस्या करने का निर्णय लिया।
पांडवों का जन्म
राजा पांडु की पत्नी कुंती को महर्षि दुर्वासा से एक दिव्य मंत्र प्राप्त हुआ था, जिससे वे किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थीं।
इसी मंत्र से पाँच पांडवों का जन्म हुआ।
| पांडव | दिव्य पिता |
|---|---|
| युधिष्ठिर | धर्मराज |
| भीम | वायु देव |
| अर्जुन | इंद्र देव |
| नकुल | अश्विनी कुमार |
| सहदेव | अश्विनी कुमार |
ये पाँचों आगे चलकर धर्म, पराक्रम और सत्य के प्रतीक बने।
कौरवों का जन्म
धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने सौ पुत्रों और एक पुत्री को जन्म दिया। सबसे बड़ा पुत्र दुर्योधन था। उसके जन्म के समय अनेक अपशकुन हुए। विदुर और भीष्म ने संकेत दिया कि यह बालक भविष्य में राज्य के लिए विनाश का कारण बन सकता है।
किन्तु पुत्र मोह में धृतराष्ट्र ने उनकी बात नहीं मानी।
गुरुकुल में शिक्षा
पांडव और कौरव दोनों ने गुरु द्रोणाचार्य से शस्त्र विद्या सीखी।
अर्जुन सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बने, जबकि भीम गदा युद्ध में अद्वितीय थे। दुर्योधन को भी गदा युद्ध में महारत प्राप्त थी।
यहीं से दुर्योधन के मन में अर्जुन और भीम के प्रति ईर्ष्या बढ़ने लगी।
दुर्योधन का पहला षड्यंत्र
दुर्योधन भीम की शक्ति से अत्यधिक भयभीत था। उसने भीम को विष देकर गंगा नदी में फेंक दिया।
लेकिन नागलोक में नागों के विष के प्रभाव से भीम और अधिक शक्तिशाली बनकर लौटे। यह दुर्योधन की पहली बड़ी असफलता थी।
लाक्षागृह का षड्यंत्र
दुर्योधन, शकुनि और कर्ण ने मिलकर पांडवों को जीवित जलाने की योजना बनाई।
वारणावत में लाख (मोम) से एक महल बनवाया गया, जिसमें आग लगते ही सब कुछ जल सकता था।
विदुर ने गुप्त रूप से पांडवों को सावधान किया। एक सुरंग के माध्यम से पाँचों पांडव और माता कुंती सुरक्षित निकल गए।
पूरा हस्तिनापुर यह मान बैठा कि पांडव जलकर मर चुके हैं।
द्रौपदी स्वयंवर
पांचाल नरेश राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित किया।
एक घूमती हुई मछली की आँख को नीचे रखे जल में प्रतिबिंब देखकर भेदना था।
अर्जुन ने ब्राह्मण वेश में यह कठिन लक्ष्य भेद दिया और द्रौपदी का विवाह उनसे हुआ।
बाद में माता कुंती के वचन के कारण द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी बनीं।
इंद्रप्रस्थ की स्थापना
राज्य विभाजन के बाद पांडवों को खांडवप्रस्थ का बंजर क्षेत्र मिला।
भगवान श्रीकृष्ण और विश्वकर्मा की कृपा से वही स्थान भव्य राजधानी इंद्रप्रस्थ में बदल गया।
युधिष्ठिर के न्यायपूर्ण शासन से इंद्रप्रस्थ शीघ्र ही समृद्ध और शक्तिशाली राज्य बन गया।
राजसूय यज्ञ और दुर्योधन का अपमान
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया। इसमें भारतवर्ष के अनेक राजा उपस्थित हुए। भगवान श्रीकृष्ण को प्रथम पूज्य का सम्मान दिया गया।
मयसभा में दुर्योधन भ्रमवश जल को भूमि और भूमि को जल समझ बैठा। वह सभा में गिर पड़ा। उपस्थित लोगों की हँसी और द्रौपदी के व्यंग्य से उसका अहंकार आहत हुआ।
यहीं से उसने पांडवों का सर्वनाश करने का निश्चय कर लिया।
द्यूत क्रीड़ा
शकुनि पासे का महान खिलाड़ी था। उसने छलपूर्वक युधिष्ठिर को जुए के लिए आमंत्रित किया।
युधिष्ठिर धर्म का पालन करते हुए निमंत्रण अस्वीकार नहीं कर सके।
एक-एक करके उन्होंने अपना धन, राज्य, भाई, स्वयं को और अंत में द्रौपदी तक को दाँव पर लगा दिया।
शकुनि ने छल से प्रत्येक बाजी जीती।
द्रौपदी चीरहरण
दुर्योधन ने दुःशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को सभा में लाए।
सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया। दुःशासन ने उनके वस्त्र खींचने का प्रयास किया।
जब सभी महान योद्धा मौन रहे, तब द्रौपदी ने पूर्ण श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया।
भगवान की कृपा से उनका चीर अनंत होता गया और दुःशासन थककर गिर पड़ा।
यह घटना महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण बनी। भीम ने उसी समय प्रतिज्ञा की कि वह दुःशासन का रक्त पिएगा और दुर्योधन की जंघा तोड़ेगा।
13 वर्ष का वनवास
द्यूत क्रीड़ा के परिणामस्वरूप पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा।
वनवास के दौरान उन्होंने अनेक ऋषियों से ज्ञान प्राप्त किया, दिव्य अस्त्र-शस्त्र हासिल किए और भविष्य के युद्ध की तैयारी की।
अर्जुन ने भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त किया, जबकि भीम ने अनेक राक्षसों का वध किया।
शांति का अंतिम प्रयास
वनवास पूर्ण होने के बाद पांडवों ने अपना राज्य वापस माँगा। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे।
उन्होंने दुर्योधन से कहा कि यदि पूरा राज्य देना संभव नहीं है, तो केवल पाँच गाँव ही दे दो।
दुर्योधन ने अहंकार में उत्तर दिया—
"मैं सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा।"
यहीं से युद्ध निश्चित हो गया।
कुरुक्षेत्र में सेनाओं का आगमन
दोनों पक्षों ने अपने-अपने मित्र राज्यों को साथ लिया। कौरवों की ओर 11 अक्षौहिणी सेना थी, जबकि पांडवों की ओर 7 अक्षौहिणी सेना।
भगवान श्रीकृष्ण ने शस्त्र न उठाने का संकल्प लिया और अर्जुन के सारथी बने।
कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर सम्पूर्ण आर्यावर्त के महानतम योद्धा एकत्र हुए। इतिहास का सबसे महान युद्ध प्रारंभ होने वाला था।
महाभारत युद्ध का इतिहास : भगवद्गीता का उपदेश और कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रथम से नवम दिन का विस्तृत इतिहास
महाभारत युद्ध का वास्तविक आरंभ कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर हुआ, जहाँ धर्म और अधर्म की निर्णायक परीक्षा होने वाली थी। एक ओर पांडवों की 7 अक्षौहिणी सेना थी, तो दूसरी ओर कौरवों की 11 अक्षौहिणी विशाल सेना। दोनों पक्षों में उस समय के लगभग सभी महान योद्धा उपस्थित थे।
इस युद्ध में केवल अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति ही नहीं, बल्कि नीति, धर्म, नेतृत्व, त्याग, साहस और भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य मार्गदर्शन की भी परीक्षा हुई। युद्ध प्रारंभ होने से ठीक पहले जो संवाद भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ, वही आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में अमर हो गया।
कुरुक्षेत्र का चयन क्यों किया गया?
कुरुक्षेत्र वर्तमान हरियाणा राज्य में स्थित एक पवित्र तीर्थ क्षेत्र है। प्राचीन काल से इसे धर्मक्षेत्र कहा जाता था। मान्यता है कि यहाँ किए गए कर्मों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
महर्षि, देवता और राजा यहाँ यज्ञ करते थे। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने भी धर्म और अधर्म के अंतिम निर्णय के लिए इसी भूमि को उपयुक्त माना।
दोनों सेनाओं का गठन
कौरव पक्ष
- भीष्म पितामह (प्रथम सेनापति)
- द्रोणाचार्य
- कृपाचार्य
- कर्ण (भीष्म के बाद युद्ध में सक्रिय)
- अश्वत्थामा
- शल्य
- जयद्रथ
- दुर्योधन
- दुःशासन
- भूरिश्रवा
- भगदत्त
पांडव पक्ष
- युधिष्ठिर
- भीमसेन
- अर्जुन
- नकुल
- सहदेव
- धृष्टद्युम्न (सेनापति)
- शिखंडी
- सात्यकि
- अभिमन्यु
- घटोत्कच
- द्रुपद
- विराट
भगवान श्रीकृष्ण का निर्णय
युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों श्रीकृष्ण से सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। भगवान ने कहा कि एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना होगी और दूसरी ओर वे स्वयं, लेकिन बिना शस्त्र उठाए।
दुर्योधन ने सेना चुनी, जबकि अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण को चुना। यही निर्णय महाभारत के परिणाम का आधार बन गया।
अर्जुन का विषाद
युद्ध प्रारंभ होने से पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहा। जब उन्होंने अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कृपाचार्य, भाइयों, मित्रों और संबंधियों को सामने देखा, तो उनका हृदय द्रवित हो गया।
उन्होंने अपना गांडीव धनुष नीचे रख दिया और कहा कि ऐसे युद्ध से प्राप्त राज्य, सुख और विजय का कोई मूल्य नहीं है।
"हे माधव! मैं अपने ही स्वजनों का वध नहीं कर सकता।"
यही वह क्षण था जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा, कर्म, भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का दिव्य उपदेश दिया।
श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। इसलिए धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना ही उनका कर्तव्य है।
गीता की प्रमुख शिक्षाएँ
- कर्तव्य से कभी पीछे न हटें।
- फल की चिंता किए बिना कर्म करें।
- आत्मा अमर है।
- धर्म की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है।
- ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखें।
गीता का यह ज्ञान आज भी संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
युद्ध का पहला दिन
शंखनाद के साथ महाभारत युद्ध प्रारंभ हुआ। सबसे पहले भीष्म पितामह ने कौरव सेना का नेतृत्व किया। उनके अद्भुत पराक्रम के सामने पांडव सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी।
अर्जुन अपने गुरु और पितामह के प्रति सम्मान के कारण पूर्ण शक्ति से युद्ध नहीं कर पा रहे थे। दूसरी ओर भीष्म पितामह ने हजारों सैनिकों का संहार कर दिया।
दिन समाप्त होने तक कौरव पक्ष का पलड़ा भारी रहा।
दूसरा दिन
दूसरे दिन भीमसेन ने अपने अद्भुत बल का प्रदर्शन किया। उन्होंने कौरव सेना के अनेक महारथियों और हाथियों का वध किया।
अर्जुन भी अब पूरी शक्ति से युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में उन्होंने कई प्रमुख योद्धाओं को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
युद्ध बराबरी की स्थिति में समाप्त हुआ।
तीसरा दिन
तीसरे दिन भीष्म पितामह ने गरुड़ व्यूह की रचना की। पांडव सेना को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
अर्जुन ने भी दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन भीष्म की युद्धकला के सामने निर्णायक सफलता नहीं मिल सकी।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बार-बार स्मरण कराया कि यह युद्ध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए है।
चौथा दिन
चौथे दिन भीमसेन ने धृतराष्ट्र के कई पुत्रों का वध किया। उनकी गदा के प्रहार से कौरव सेना में भय फैल गया।
दुर्योधन स्वयं युद्धभूमि में भीम का सामना करने आया, लेकिन घायल होकर पीछे हटना पड़ा।
इस दिन पांडवों का मनोबल बढ़ा।
पाँचवाँ दिन
पाँचवें दिन द्रोणाचार्य और अर्जुन के बीच भीषण युद्ध हुआ। गुरु और शिष्य दोनों एक-दूसरे की शक्ति से परिचित थे।
यद्यपि दोनों ने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला।
भीष्म पितामह लगातार पांडव सेना को भारी क्षति पहुँचाते रहे।
छठा दिन
छठे दिन युद्ध अत्यंत उग्र हो गया। भीम, सात्यकि और धृष्टद्युम्न ने मिलकर कौरव सेना पर भीषण आक्रमण किया।
कौरवों की ओर से अश्वत्थामा और कृपाचार्य ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया।
दोनों पक्षों के हजारों सैनिक मारे गए। युद्ध अब और भी विनाशकारी होता जा रहा था।
सातवाँ दिन
सातवें दिन अर्जुन और भीष्म के बीच लंबा युद्ध हुआ। अर्जुन अपनी पूरी क्षमता से लड़ रहे थे, लेकिन भीष्म पितामह की इच्छा-मृत्यु के वरदान और अपार युद्ध कौशल के कारण उन्हें पराजित करना संभव नहीं हो रहा था।
दूसरी ओर भीम ने फिर अनेक कौरव राजकुमारों का वध किया।
आठवाँ दिन
आठवें दिन भीमसेन का पराक्रम चरम पर था। उन्होंने दुर्योधन के कई भाइयों का वध कर दिया।
दुर्योधन अत्यंत क्रोधित हुआ और भीष्म से शिकायत की कि वे पांडवों के प्रति नरम व्यवहार कर रहे हैं।
भीष्म ने उत्तर दिया कि वे पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पांडवों के साथ हैं, इसलिए उनकी विजय निश्चित है।
नौवाँ दिन
नौवें दिन भीष्म पितामह ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। उन्होंने अकेले ही हजारों सैनिकों का वध कर दिया। पांडव सेना पूरी तरह विचलित हो गई।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि यदि ऐसा ही चलता रहा, तो पांडवों की हार निश्चित है।
वे क्रोधित होकर रथ से उतरे और टूटे हुए रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़े।
भीष्म ने प्रसन्न होकर अपने अस्त्र नीचे कर दिए और कहा—
"प्रभु! यदि आपकी प्रतिज्ञा टूटकर मेरे हाथों मृत्यु मिले, तो यह मेरा सौभाग्य होगा।"
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को रोक लिया और उन्हें अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कराया। इसके बाद भगवान शांत हुए और पुनः रथ पर लौट आए।
इसी दिन यह निर्णय लिया गया कि भीष्म को पराजित करने के लिए शिखंडी को सामने रखा जाएगा, क्योंकि भीष्म शिखंडी पर अस्त्र नहीं उठाएँगे।
युद्ध के पहले नौ दिनों का परिणाम
- कौरव सेना को सामरिक बढ़त मिली।
- भीष्म पितामह सबसे शक्तिशाली योद्धा सिद्ध हुए।
- पांडव सेना को भारी क्षति पहुँची।
- अर्जुन का मोह पूरी तरह समाप्त हुआ।
- भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान सम्पूर्ण मानवता को प्राप्त हुआ।
- भीष्म को हटाने की रणनीति तैयार की गई।
महाभारत युद्ध का इतिहास : भीष्म पितामह का पतन, अभिमन्यु वध, जयद्रथ वध, कर्ण-अर्जुन युद्ध और महायुद्ध का अंत
महाभारत युद्ध के पहले नौ दिनों तक भीष्म पितामह के नेतृत्व में कौरव सेना का पलड़ा भारी रहा। पांडव सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की रणनीति ने युद्ध की दिशा बदलने की योजना तैयार कर ली थी।
दसवें दिन से युद्ध और भी अधिक भीषण हो गया। अब केवल सेनाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन इतिहास बदलने वाली घटनाएँ घटने लगीं। भीष्म पितामह का पतन, चक्रव्यूह, अभिमन्यु का बलिदान, अर्जुन की प्रतिज्ञा, जयद्रथ वध, घटोत्कच का बलिदान, कर्ण-अर्जुन का अंतिम युद्ध और दुर्योधन का अंत—इन सभी घटनाओं ने महाभारत को अमर बना दिया।
दसवाँ दिन – भीष्म पितामह का पतन
भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि जब तक भीष्म पितामह युद्धभूमि में हैं, तब तक पांडवों की विजय अत्यंत कठिन है। उन्होंने अर्जुन को बताया कि भीष्म कभी भी शिखंडी पर अस्त्र नहीं उठाएँगे, क्योंकि वे उन्हें पूर्वजन्म की अम्बा मानते थे।
दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ के आगे रखा। भीष्म ने प्रतिज्ञा के अनुसार शिखंडी पर शस्त्र नहीं चलाए। उसी अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने अपने गांडीव से सैकड़ों बाण छोड़े।
भीष्म का पूरा शरीर बाणों से ढक गया और वे भूमि पर नहीं गिरे, बल्कि बाणों की शय्या पर ही टिक गए।
इच्छा-मृत्यु के वरदान के कारण उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने उत्तरायण आने तक उसी अवस्था में रहने का निर्णय लिया।
"धर्म की विजय निश्चित है, इसलिए मैं आज अपने शस्त्र त्यागता हूँ।"
भीष्म से प्राप्त अमूल्य ज्ञान
बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, दानधर्म, नीति, शासन, समाज और मोक्ष का अद्भुत ज्ञान दिया। यही उपदेश आगे चलकर शांति पर्व और अनुशासन पर्व के रूप में महाभारत का महत्वपूर्ण भाग बने।
ग्यारहवें दिन – द्रोणाचार्य बने सेनापति
भीष्म के युद्ध से हटने के बाद कौरव सेना का नेतृत्व गुरु द्रोणाचार्य को सौंपा गया। वे उस समय के महानतम धनुर्धरों और युद्धनीतिज्ञों में से एक थे।
द्रोणाचार्य ने युद्ध की दिशा बदलने के लिए अनेक जटिल व्यूहों की रचना की और पांडव सेना पर भीषण आक्रमण प्रारंभ किया।
बारहवाँ दिन – चक्रव्यूह की तैयारी
द्रोणाचार्य जानते थे कि यदि युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए तो युद्ध समाप्त हो सकता है। इसलिए उन्होंने अगले दिन चक्रव्यूह बनाने का निर्णय लिया।
उस समय अर्जुन और श्रीकृष्ण को युद्धभूमि के दूसरे छोर पर व्यस्त रखने की योजना भी बनाई गई।
तेरहवाँ दिन – अभिमन्यु का अमर बलिदान
तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने प्रसिद्ध चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन उस समय अन्य योद्धाओं से युद्ध कर रहे थे।
पांडव सेना में केवल अभिमन्यु ही चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानते थे। उन्हें बाहर निकलने की विधि ज्ञात नहीं थी, क्योंकि गर्भ में रहते समय उन्होंने केवल प्रवेश की प्रक्रिया ही सुनी थी।
फिर भी धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने व्यूह में प्रवेश किया।
अभिमन्यु ने अकेले ही द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा और दुर्योधन सहित अनेक महारथियों का सामना किया।
युद्ध के नियमों का उल्लंघन करते हुए सात महारथियों ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु पर एक साथ आक्रमण किया। अंततः वीर अभिमन्यु युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।
उनका बलिदान भारतीय इतिहास में अद्वितीय साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
अर्जुन की प्रतिज्ञा
जब अर्जुन को अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार मिला, तो वे अत्यंत व्यथित हुए। उन्होंने प्रतिज्ञा की—
"यदि मैं कल सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध न कर सकूँ, तो अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा।"
यह प्रतिज्ञा पूरे युद्ध की दिशा बदलने वाली सिद्ध हुई।
चौदहवाँ दिन – जयद्रथ वध
दुर्योधन ने जयद्रथ की रक्षा के लिए कौरव सेना की सबसे मजबूत व्यवस्था की। द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य लगातार अर्जुन को रोकते रहे।
सूर्यास्त निकट आ गया। तभी भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से कुछ समय के लिए सूर्य को बादलों से ढक दिया। कौरव सेना को लगा कि सूर्यास्त हो गया है।
जयद्रथ अपनी सुरक्षा से बाहर आया। उसी क्षण भगवान ने अर्जुन को संकेत दिया।
अर्जुन ने दिव्य बाण से जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।
इसके बाद सूर्य पुनः दिखाई दिया। पूरी कौरव सेना भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला देखकर स्तब्ध रह गई।
रात्रि युद्ध और घटोत्कच का पराक्रम
महाभारत का चौदहवाँ दिन रात्रि तक चला। रात्रि में राक्षसों की शक्ति बढ़ जाती थी, इसलिए भीमपुत्र घटोत्कच ने कौरव सेना में भारी विनाश मचा दिया।
कर्ण को विवश होकर अपनी अमोघ वासवी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा, जिसे वह अर्जुन के लिए बचाकर रखना चाहता था।
वासवी शक्ति से घटोत्कच वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए क्योंकि अब कर्ण के पास अर्जुन को मारने वाला सबसे शक्तिशाली अस्त्र नहीं बचा था।
पंद्रहवाँ दिन – द्रोणाचार्य का अंत
द्रोणाचार्य को पराजित करना लगभग असंभव था। भगवान श्रीकृष्ण ने समझा कि जब तक वे शस्त्र नहीं त्यागेंगे, युद्ध समाप्त नहीं होगा।
भीम ने हाथी अश्वत्थामा का वध किया और जोर से कहा—
"अश्वत्थामा मारा गया!"
द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से सत्य जानना चाहा। युधिष्ठिर ने कहा—
"अश्वत्थामा हतः..."
और धीरे से जोड़ा—"नरो वा कुंजरो वा" (मनुष्य या हाथी)।
द्रोणाचार्य ने केवल पहला भाग सुना। उन्होंने शस्त्र त्याग दिए। उसी समय धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।
सोलहवाँ दिन – कर्ण बने सेनापति
द्रोणाचार्य के बाद कौरव सेना का नेतृत्व कर्ण को मिला। अब पूरे युद्ध की दिशा कर्ण और अर्जुन के अंतिम संघर्ष की ओर बढ़ रही थी।
कर्ण ने इस दिन अनेक पांडव योद्धाओं को पराजित किया। उनके अद्भुत पराक्रम ने कौरव सेना का मनोबल बढ़ाया।
सत्रहवाँ दिन – कर्ण और अर्जुन का महायुद्ध
महाभारत का सबसे प्रतीक्षित युद्ध सत्रहवें दिन हुआ। अर्जुन और कर्ण दोनों अपने-अपने समय के महानतम धनुर्धर थे।
दोनों ने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया। युद्ध घंटों तक चलता रहा।
इसी बीच कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धँस गया। यह उन्हें मिले पूर्व श्रापों का परिणाम था।
कर्ण ने अर्जुन से युद्ध रोकने का आग्रह किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्मरण कराया कि अभिमन्यु की हत्या भी युद्ध के नियमों का उल्लंघन करके की गई थी।
श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने अंजलिकास्त्र चलाया और कर्ण का वध कर दिया।
कर्ण की मृत्यु के साथ कौरव सेना का सबसे शक्तिशाली योद्धा भी समाप्त हो गया।
अठारहवाँ दिन – अंतिम युद्ध
अब कौरव सेना लगभग पराजित हो चुकी थी। शल्य सेनापति बने, लेकिन वे भी अधिक समय तक टिक नहीं सके।
सहदेव ने शकुनि का वध किया। यह वही शकुनि था जिसने द्यूत क्रीड़ा के माध्यम से महाभारत की नींव रखी थी।
दुःशासन पहले ही भीम के हाथों मारा जा चुका था और भीम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए उसका रक्त अपने होंठों से स्पर्श किया।
भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
अंत में केवल दुर्योधन शेष बचा। वह एक सरोवर में छिप गया, लेकिन उसे खोज लिया गया।
भीम और दुर्योधन के बीच गदा युद्ध प्रारंभ हुआ। दुर्योधन गदा युद्ध में अत्यंत कुशल था।
भगवान श्रीकृष्ण ने संकेत दिया कि दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करना ही विजय का मार्ग है, क्योंकि उसी जंघा का अपमानजनक संकेत उसने द्रौपदी को दिया था।
भीम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए दुर्योधन की जंघा तोड़ दी।
यही महाभारत युद्ध की निर्णायक विजय थी।
अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
दुर्योधन की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा क्रोध से भर गया। रात में उसने कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ पांडव शिविर पर आक्रमण किया।
सोते हुए धृष्टद्युम्न, शिखंडी तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्रों (उपपांडवों) का वध कर दिया गया।
यह महाभारत युद्ध की सबसे दुखद घटनाओं में से एक मानी जाती है।
महायुद्ध का परिणाम
- कौरवों के सभी 100 भाई मारे गए।
- पांडव पक्ष के भी अनेक महान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।
- कुरु वंश लगभग समाप्त हो गया।
- धर्म की विजय हुई, लेकिन इसकी कीमत अत्यंत भारी थी।
- भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म का अंत कर धर्म की स्थापना की।
महाभारत युद्ध का इतिहास : युद्ध के बाद क्या हुआ, गांधारी का श्राप, श्रीकृष्ण का प्रस्थान, कलियुग का आरंभ और महाभारत से मिलने वाली शिक्षाएँ
महाभारत युद्ध अठारह दिनों तक चला और अंत में पांडवों की विजय हुई। लेकिन यह विजय उत्सव का नहीं, बल्कि त्याग, पीड़ा और विनाश का प्रतीक थी। दोनों पक्षों के लाखों योद्धा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। कुरु वंश लगभग समाप्त हो गया और सम्पूर्ण आर्यावर्त शोक में डूब गया।
महाभारत का वास्तविक संदेश युद्ध की समाप्ति के बाद और अधिक स्पष्ट होता है। विजय के बाद युधिष्ठिर का पश्चाताप, भीष्म पितामह का अंतिम उपदेश, गांधारी का श्राप, भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी से प्रस्थान और कलियुग का आरंभ—ये सभी घटनाएँ मानव जीवन के लिए गहन प्रेरणा और चेतावनी देती हैं।
महायुद्ध के बाद कुरुक्षेत्र का दृश्य
अठारहवें दिन युद्ध समाप्त हुआ तो कुरुक्षेत्र की भूमि रक्त से लाल हो चुकी थी। जहाँ कभी लाखों सैनिकों का उत्साह था, वहाँ अब केवल टूटे हुए रथ, बिखरे हुए अस्त्र-शस्त्र, मृत योद्धा और शोक की निस्तब्धता थी।
पांडव विजयी अवश्य हुए, लेकिन उन्होंने अपने गुरु, पितामह, पुत्र, मित्र और अनेक प्रियजनों को खो दिया था। इसलिए इस विजय में आनंद नहीं था।
युधिष्ठिर का पश्चाताप
युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत दुःखी हो गए। उन्होंने कहा कि यदि इस राज्य की प्राप्ति के लिए इतने लोगों का वध करना पड़ा, तो ऐसा राज्य उन्हें स्वीकार नहीं है।
उन्होंने सिंहासन त्यागने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण, महर्षि व्यास और अन्य ऋषियों ने उन्हें समझाया कि उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध किया है, इसलिए उन्हें राज्य का दायित्व निभाना चाहिए।
भीष्म पितामह का अंतिम उपदेश
भीष्म पितामह अभी भी बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर सहित सभी पांडवों को उनके पास ले गए।
भीष्म ने युधिष्ठिर को अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर उपदेश दिए—
- राजधर्म
- न्यायपूर्ण शासन
- दान और धर्म
- प्रजा का पालन
- राजा के कर्तव्य
- मोक्ष का मार्ग
- सत्य और नीति
महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में इन उपदेशों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
भीष्म पितामह का देहत्याग
जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। देवताओं ने पुष्पवर्षा की और समस्त योद्धाओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारतीय इतिहास में भीष्म पितामह त्याग, सत्य, प्रतिज्ञा और धर्मनिष्ठा के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं।
युधिष्ठिर का राज्याभिषेक
भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति में धर्मराज युधिष्ठिर का हस्तिनापुर के राजा के रूप में राज्याभिषेक हुआ।
भीम युवराज बने, अर्जुन ने राज्य की रक्षा का दायित्व संभाला, नकुल और सहदेव ने प्रशासन तथा सेना की व्यवस्था देखी।
युधिष्ठिर के शासन को भारतीय इतिहास के सबसे न्यायपूर्ण और आदर्श शासनकालों में गिना जाता है।
अश्वमेध यज्ञ
राज्य को स्थिर करने और धर्म की पुनः स्थापना के लिए युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया।
इस यज्ञ के माध्यम से अनेक राज्यों ने हस्तिनापुर की अधीनता स्वीकार की और पूरे आर्यावर्त में पुनः शांति स्थापित हुई।
गांधारी का श्राप
गांधारी ने युद्ध में अपने सौ पुत्रों को खो दिया था। वे भगवान श्रीकृष्ण से बोलीं कि यदि वे चाहते तो यह युद्ध रोक सकते थे।
उन्होंने दुःख और क्रोध में भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार उनका वंश नष्ट हुआ है, उसी प्रकार भविष्य में यादव वंश का भी अंत होगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने उस श्राप को शांत भाव से स्वीकार किया, क्योंकि वे जानते थे कि समय आने पर उनका पृथ्वी पर अवतार कार्य पूर्ण हो जाएगा।
यादव वंश का अंत
महाभारत युद्ध के लगभग 36 वर्ष बाद द्वारका में यादवों के बीच आपसी विवाद उत्पन्न हुआ। धीरे-धीरे यह संघर्ष भीषण युद्ध में बदल गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि गांधारी का श्राप अब फलित हो रहा है। अधिकांश यादव वीर एक-दूसरे के हाथों मारे गए और शक्तिशाली यादव वंश का अंत हो गया।
भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी से प्रस्थान
यादव वंश के अंत के बाद भगवान श्रीकृष्ण वन में ध्यानमग्न होकर बैठे थे। उसी समय जरा नामक एक शिकारी ने उनके चरण को हिरण का मुख समझकर बाण चला दिया।
जब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो वह अत्यंत दुःखी हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे क्षमा किया और बताया कि यह भी पूर्वनियोजित दिव्य लीला का भाग है।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य धाम को प्रस्थान कर गए। उनके पृथ्वी से प्रस्थान के साथ ही द्वापर युग का समापन माना जाता है।
कलियुग का आरंभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद कलियुग का आरंभ हुआ।
कलियुग में धर्म का एक ही चरण शेष रहता है, लेकिन भगवान ने यह भी कहा कि इस युग में नामस्मरण, भक्ति और भगवद्गीता का अध्ययन सबसे सरल और प्रभावी साधना है।
महाभारत के प्रमुख पात्र
| पात्र | विशेषता |
|---|---|
| भगवान श्रीकृष्ण | योगेश्वर, मार्गदर्शक और धर्म के रक्षक |
| युधिष्ठिर | धर्म और सत्य के प्रतीक |
| भीम | अद्भुत बल और प्रतिज्ञा के प्रतीक |
| अर्जुन | श्रेष्ठ धनुर्धर एवं भगवद्गीता के श्रोता |
| नकुल | सौंदर्य और अश्वविद्या में निपुण |
| सहदेव | ज्ञान और ज्योतिष के विद्वान |
| द्रौपदी | साहस और आत्मसम्मान की प्रतीक |
| भीष्म | त्याग और प्रतिज्ञा के प्रतीक |
| द्रोणाचार्य | महान गुरु और धनुर्विद्या आचार्य |
| कर्ण | दानवीर और महान योद्धा |
| विदुर | नीति और धर्म के ज्ञाता |
| दुर्योधन | अहंकार और लोभ का प्रतीक |
| शकुनि | कपट और राजनीति का प्रतीक |
| अभिमन्यु | वीरता और बलिदान के प्रतीक |
महाभारत से मिलने वाली 20 प्रमुख शिक्षाएँ
- धर्म की विजय निश्चित होती है।
- अहंकार विनाश का कारण बनता है।
- लोभ परिवार और समाज को नष्ट कर देता है।
- सत्य का मार्ग कठिन लेकिन श्रेष्ठ है।
- कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।
- गुरु का सम्मान जीवन का आधार है।
- स्त्री का सम्मान सर्वोच्च धर्म है।
- अन्याय का विरोध आवश्यक है।
- अधर्म का साथ देने वाला भी दोषी होता है।
- धैर्य सफलता की कुंजी है।
- क्रोध निर्णय शक्ति को नष्ट कर देता है।
- मित्रता निस्वार्थ होनी चाहिए।
- नेतृत्व में विनम्रता आवश्यक है।
- परिवार में संवाद का महत्व है।
- क्षमा महानता का गुण है।
- सही समय पर सही निर्णय आवश्यक है।
- जीवन परिवर्तनशील है।
- ईश्वर पर विश्वास कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- भगवद्गीता जीवन का श्रेष्ठ मार्गदर्शक है।
- धर्मो रक्षति रक्षितः।
महाभारत युद्ध से जुड़े रोचक तथ्य
- महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला।
- कौरव पक्ष में 11 अक्षौहिणी सेना थी।
- पांडव पक्ष में 7 अक्षौहिणी सेना थी।
- भगवद्गीता का उपदेश युद्ध प्रारंभ होने से पहले दिया गया।
- महर्षि वेदव्यास महाभारत के रचयिता हैं।
- भगवान श्रीगणेश ने महाभारत का लेखन किया।
- महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है।
- भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था।
- कर्ण सूर्यपुत्र थे।
- अभिमन्यु ने अकेले चक्रव्यूह भेदा था।
महाभारत का आधुनिक जीवन में महत्व
महाभारत केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है। आज के समय में परिवार, राजनीति, व्यवसाय, नेतृत्व, शिक्षा और व्यक्तिगत जीवन—हर क्षेत्र में महाभारत की शिक्षाएँ मार्गदर्शन करती हैं।
- नेतृत्व में न्याय और निष्पक्षता रखें।
- सत्य का साथ दें, चाहे परिस्थितियाँ कठिन हों।
- सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण चरित्र है।
- परिवार में संवाद और विश्वास बनाए रखें।
- कठिन समय में भगवान पर विश्वास रखें।
निष्कर्ष
महाभारत युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा नैतिक और आध्यात्मिक संदेश है। यह हमें बताता है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः विजय धर्म और सत्य की ही होती है।
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन, भगवद्गीता का उपदेश, पांडवों का धैर्य, भीष्म का त्याग, कर्ण का दान, विदुर की नीति और द्रौपदी का आत्मसम्मान—ये सभी आज भी हमारे जीवन को दिशा देने वाले अमूल्य आदर्श हैं।
यदि हम महाभारत को केवल युद्ध की कथा न मानकर जीवन के मार्गदर्शक ग्रंथ के रूप में पढ़ें, तो यह हमारे विचार, निर्णय और व्यक्तित्व को नई दिशा दे सकता है।
॥ यतो धर्मस्ततो जयः ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
आज का पंचांग 13 अगस्त 2026
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