ज्वाला जी माता कथा – अध्याय 2: विष्णु चक्र: शक्ति पीठ का निर्माण | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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ज्वाला जी माता कथा – अध्याय 2: विष्णु चक्र: शक्ति पीठ का निर्माण

Tilak Kathayein13 Apr 202667 views📖 1 min read
ज्वाला जी माता कथा
ज्वाला जी माता कथा का अध्याय 2 — विष्णु चक्र: शक्ति पीठ का निर्माण। भगवान विष्णु के चक्र से सती के शरीर के टुकड़े अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जिससे ज्वाला जी शक्ति पीठ बना।

विष्णु चक्र: शक्ति पीठ का निर्माण

पिछले अध्याय में हमने सती के आत्मदाह और शिव के क्रोध का वर्णन सुना। सती के बलिदान के बाद, शिव का शोक विकराल रूप धारण कर गया था। वे सती के निष्प्राण शरीर को लेकर ब्रह्मांड में तांडव करने लगे, जिससे सृष्टि में प्रलय का संकट मंडराने लगा। देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु से इस संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।

विष्णु का हस्तक्षेप: सुदर्शन चक्र का उपयोग

भगवान विष्णु, देवताओं की प्रार्थना सुनकर तुरंत प्रकट हुए। उन्होंने देखा कि शिव का क्रोध और शोक सृष्टि को भस्म करने पर तुला है। शिव के तांडव के कारण पृथ्वी कांप रही थी, सागर उफान पर थे, और अग्नि की लपटें आकाश को छू रही थीं। विष्णु जानते थे कि इस विभीषिका को रोकने के लिए उन्हें हस्तक्षेप करना होगा। उनका हृदय शिव के प्रति सहानुभूति से भरा था, फिर भी सृष्टि की रक्षा करना उनका कर्तव्य था।

"हे शिव, मैं जानता हूं तुम्हारा दुःख अपरिमित है," विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "परन्तु इस शोक से सृष्टि को नष्ट मत करो। सती का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। तुम्हें शांत होना होगा, ताकि धर्म की पुनर्स्थापना हो सके।" इसके बाद भी जब शिव का तांडव नही रुका, तब विष्णु को विवश होकर सुदर्शन चक्र का प्रयोग करना पड़ा।

सती के अंगों का विभाजन: शक्ति पीठों की उत्पत्ति

भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। चक्र, तीव्र गति से घूमता हुआ, शिव के आसपास चक्कर काटने लगा। फिर, एक क्षण में, चक्र ने सती के शरीर को कई टुकड़ों में विभाजित कर दिया। देखते ही देखते, सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर गिरने लगे। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे स्थान तीर्थ बन गए, जिन्हें शक्तिपीठ के नाम से जाना गया। प्रत्येक शक्तिपीठ एक दिव्य शक्ति का केंद्र बन गया, जहाँ माँ भगवती विभिन्न रूपों में विराजमान हैं।

ऐसा माना जाता है कि जिस स्थान पर सती की जीभ गिरी, वह ज्वाला जी का स्थान है। इस स्थान पर, पृथ्वी के गर्भ से स्वतः ही ज्वालाएं प्रज्वलित होती रहती हैं, जो माँ सती की शक्ति का प्रतीक हैं। इन ज्वालाओं का दर्शन करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। ज्वाला जी में माँ सती ज्वाला रूप में विराजमान हैं और अपने भक्तों को सदैव आशीर्वाद देती हैं।

ज्वाला जी में जीभ का गिरना: शक्ति का प्रकटीकरण

सती के शरीर के अंगों के गिरने के साथ ही, पृथ्वी पर एक अद्भुत शक्ति का संचार हुआ। ज्वाला जी में, जहाँ सती की जीभ गिरी, वहां एक अद्वितीय प्रकाश उत्पन्न हुआ। वह प्रकाश धीरे-धीरे ज्वाला में परिवर्तित हो गया, जो आज भी अनवरत रूप से जल रही है। ये ज्वालाएं किसी भी प्रकार की सामग्री से नहीं जलतीं, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाली ऊर्जा के कारण प्रज्वलित हैं। ये ज्वालाएं माँ सती की अमरता और शक्ति का प्रतीक हैं, जो भक्तों को निरंतर यह याद दिलाती हैं कि सत्य और प्रेम की शक्ति हमेशा बनी रहती है।

शिव का तांडव धीमा पड़ गया था लेकिन उनका शोक अभी भी गहरा था। विष्णु के इस कार्य से सृष्टि को विनाश से बचाया जा सका था। परन्तु अब इन शक्ति पीठों तथा ज्वाला जी की खोज होनी बाकी थी। अगले अध्याय में हम पढ़ेंगे ज्वाला जी की खोज की कथा।

अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र का उपयोग करके सती के शरीर को विभाजित किया, जिसके परिणाम स्वरूप शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। ज्वाला जी में सती की जीभ गिरने से, वहाँ ज्वाला का प्रकटीकरण हुआ, जो दिव्य शक्ति का प्रतीक है, यह दर्शाता है कि भक्ति और त्याग की भावना से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

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