Jagannath Puri Temple History in Hindi | स्थापना और महत्व - Tilak Kathayein
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Jagannath Puri Temple History in Hindi | स्थापना और महत्व, जगन्नाथ पुरी धाम का इतिहास

Tilak Kathayein04 Jul 202611 views📖 1 min read
ऐसे हुई थी स्थापना जगन्नाथ पूरी धाम की
जगन्नाथ पुरी धाम भारत के चार पवित्र धामों में से एक है और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा देवी सुभद्रा को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिव्य धाम की स्थापना राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु की आज्ञा से करवाई थी। इस लेख में जानें जगन्नाथ पुरी धाम की स्थापना की अद्भुत कथा, इसका इतिहास, धार्मिक महत्व और इससे जुड़े रोचक रहस्यों के बारे में।
ऐसे हुई थी स्थापना जगन्नाथ पुरी धाम की: जानें अद्भुत इतिहास, पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

ऐसे हुई थी स्थापना जगन्नाथ पुरी धाम की

भारत के चार पवित्र धामों में से एक जगन्नाथ पुरी धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ओडिशा के पुरी शहर में स्थित यह दिव्य धाम भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को समर्पित है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और प्रसिद्ध रथ यात्रा में भाग लेते हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस पवित्र धाम की स्थापना कैसे हुई? इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा है? क्यों भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अन्य मंदिरों की मूर्तियों से बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं? आइए जानते हैं इस अद्भुत धाम की स्थापना का इतिहास।


जगन्नाथ पुरी धाम की स्थापना की पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्हें भगवान के दुर्लभ स्वरूप नील माधव के बारे में जानकारी मिली। कहा जाता था कि उनकी पूजा एक घने वन में गुप्त रूप से की जाती है।

राजा ने अपने विश्वसनीय ब्राह्मण विद्यापति को नील माधव की खोज के लिए भेजा।

नील माधव की खोज

कई दिनों तक खोज करने के बाद विद्यापति की मुलाकात शबर जनजाति के प्रमुख विश्ववसु से हुई, जो गुप्त रूप से नील माधव की पूजा करते थे।

विश्ववसु किसी को भी भगवान के दर्शन नहीं करवाते थे। काफी आग्रह के बाद उन्होंने विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें मंदिर तक पहुंचाया।

मान्यता है कि रास्ते में विद्यापति ने चुपके से सरसों के बीज गिरा दिए। कुछ समय बाद उन्हीं बीजों से उगे पौधों की सहायता से उन्हें मंदिर तक पहुंचने का मार्ग मिल गया।


भगवान नील माधव हुए अंतर्ध्यान

जब राजा इंद्रद्युम्न स्वयं भगवान नील माधव के दर्शन के लिए पहुंचे, तब तक भगवान अंतर्ध्यान हो चुके थे। इससे राजा अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की।

भगवान विष्णु ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि समुद्र तट पर एक दिव्य दारु (पवित्र लकड़ी) प्रकट होगी। उसी से उनके नए स्वरूप की स्थापना की जाए।


दारु ब्रह्म से भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों का निर्माण

कुछ समय बाद समुद्र किनारे एक दिव्य लकड़ी का विशाल लट्ठा मिला, जिसे दारु ब्रह्म कहा गया।

कोई भी उस लकड़ी को काट नहीं पा रहा था। तभी एक वृद्ध बढ़ई राजा के पास आए। मान्यता है कि वे स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे।

उन्होंने शर्त रखी कि वे बंद कमरे में मूर्तियों का निर्माण करेंगे और कार्य पूरा होने तक कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा।


अधूरी रह गईं भगवान की मूर्तियां

कई दिनों तक कमरे से कोई आवाज नहीं आई। रानी गुंडिचा को चिंता हुई और उन्होंने राजा से दरवाजा खुलवाने का आग्रह किया।

जैसे ही दरवाजा खोला गया, वृद्ध बढ़ई अदृश्य हो चुके थे और भगवान की मूर्तियां पूर्ण रूप से तैयार नहीं थीं। उनके हाथ और पैर अधूरे थे।

"यही मेरा दिव्य स्वरूप है। इसी रूप में मेरी पूजा होगी।"

इसी कारण आज भी भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी दिखाई देती हैं।


जगन्नाथ मंदिर की स्थापना

राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की विधिपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करवाई और भव्य मंदिर की स्थापना की।

वर्तमान मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा कराया गया माना जाता है।


जगन्नाथ पुरी धाम का धार्मिक महत्व

चार धामों में विशेष स्थान

जगन्नाथ पुरी भारत के चार प्रमुख धामों में शामिल है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

भगवान का अनोखा स्वरूप

भगवान जगन्नाथ का स्वरूप यह संदेश देता है कि ईश्वर किसी सीमा में बंधे नहीं हैं और वे सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं।

विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा

हर वर्ष आषाढ़ मास में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है।


जगन्नाथ पुरी धाम से जुड़े रोचक तथ्य

  • मंदिर का ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता हुआ प्रतीत होता है।
  • मंदिर के शिखर पर स्थित सुदर्शन चक्र किसी भी दिशा से देखने पर सामने ही दिखाई देता है।
  • यहां का महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता और न ही व्यर्थ जाता है।
  • नवकलेवर उत्सव के दौरान भगवान की नई मूर्तियों का निर्माण पवित्र दारु से किया जाता है।

हमें इस कथा से क्या सीख मिलती है?

  • सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
  • भगवान अपने भक्तों की श्रद्धा से प्रसन्न होकर मार्ग दिखाते हैं।
  • धैर्य और विश्वास जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।
  • ईश्वर का स्वरूप हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. जगन्नाथ पुरी धाम की स्थापना किसने की थी?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की प्राण प्रतिष्ठा कर मंदिर की स्थापना करवाई थी।

2. भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं?

मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा मूर्तियों का निर्माण कर रहे थे, लेकिन समय से पहले दरवाजा खोल दिए जाने के कारण मूर्तियां उसी स्वरूप में स्थापित कर दी गईं।

3. जगन्नाथ पुरी चार धामों में क्यों शामिल है?

यह भगवान विष्णु के प्रमुख धामों में से एक है और सनातन धर्म में मोक्ष प्रदान करने वाले चार पवित्र धामों में इसकी गणना होती है।

4. दारु ब्रह्म क्या है?

समुद्र से प्राप्त वह दिव्य पवित्र लकड़ी, जिससे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों का निर्माण हुआ, उसे दारु ब्रह्म कहा जाता है।

5. जगन्नाथ पुरी की सबसे प्रसिद्ध परंपरा कौन-सी है?

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं।


निष्कर्ष

जगन्नाथ पुरी धाम की स्थापना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा, भक्ति और ईश्वर की दिव्य लीला का अद्भुत उदाहरण है। राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति, नील माधव की खोज, दारु ब्रह्म का प्रकट होना और भगवान जगन्नाथ के अनोखे स्वरूप की स्थापना हमें यह संदेश देती है कि सच्ची आस्था के सामने असंभव भी संभव हो जाता है। यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ पुरी धाम करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए मोक्ष, भक्ति और दिव्य कृपा का पवित्र केंद्र बना हुआ है।


जय जगन्नाथ!

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