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भागवद गीता

Bhagavad Gita

21 लेख

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 3 | दुर्योधन का द्रोणाचार्य से पहला संबोधन | संपूर्ण अर्थ एवं व्याख्या
भागवद गीता

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 3 | दुर्योधन का द्रोणाचार्य से पहला संबोधन | संपूर्ण अर्थ एवं व्याख्या

भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का तीसरा श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब तक दुर्योधन केवल पाण्डवों की सेना को देख रहा था, लेकिन इस श्लोक में वह पहली बार अपने गुरु द्रोणाचार्य से सीधे संवाद करता है। उसके शब्दों में सम्मान दिखाई देता है, किन्तु उनके पीछे छिपी राजनीतिक बुद्धिमत्ता, मनोवैज्ञानिक दबाव और युद्धनीति भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

10 Aug 202658
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 2 | दुर्योधन का द्रोणाचार्य से संवाद | संपूर्ण अर्थ एवं व्याख्या
भागवद गीता

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 2 | दुर्योधन का द्रोणाचार्य से संवाद | संपूर्ण अर्थ एवं व्याख्या

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का दूसरा श्लोक महाभारत युद्ध के प्रारम्भिक वातावरण को और अधिक स्पष्ट करता है। इस श्लोक में दुर्योधन पाण्डवों की विशाल सेना को देखकर अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है। उसके शब्दों में आत्मविश्वास दिखाई देता है, किंतु उसके भीतर छिपी चिंता और रणनीतिक सोच भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आइए इस श्लोक का शब्दार्थ, सरल अर्थ और गहन महत्व विस्तार से समझते हैं।

27 Jul 202681
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 1 – धृतराष्ट्र उवाच: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे… | संपूर्ण अर्थ, शब्दार्थ और विस्तृत परिचय
भागवद गीता

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 1 – धृतराष्ट्र उवाच: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे… | संपूर्ण अर्थ, शब्दार्थ और विस्तृत परिचय

भगवद्गीता का प्रथम श्लोक केवल युद्धभूमि का वर्णन नहीं है, बल्कि मानव मन, धर्म, कर्तव्य और मोह के बीच चलने वाले आंतरिक संघर्ष का भी प्रतीक है। आइए जानें इस श्लोक का गहरा अर्थ और इसका आध्यात्मिक संदेश।

26 Jul 202679
Chapter 18 : Moksha Sanyasa Yoga – अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोगः
भागवद गीता

Chapter 18 : Moksha Sanyasa Yoga – अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोगः

अर्जुन उवाच: सन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ।। अर्जुन बोले- हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन् ! हे वासुदेव ! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको पृथक्- पृथक्…

22 Feb 2025249
Chapter 17 : Shraddha Traya Vibhaga Yoga – अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग
भागवद गीता

Chapter 17 : Shraddha Traya Vibhaga Yoga – अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग

अर्जुन उवाच: ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ।। अर्जुन बोले- हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधिको त्यागकर श्रद्धासे युक्त हुए देवादिका पूजन करते…

20 Feb 2025193
Chapter 16 : Daivasura Sampad Vibhaga Yoga – अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
भागवद गीता

Chapter 16 : Daivasura Sampad Vibhaga Yoga – अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

श्रीभगवानुवाच: अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ श्रीभगवान् बोले- भयका सर्वथा अभाव, अन्तःकरणकी पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगमें निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियोंका दमन, भगवान्,…

18 Feb 2025166
Chapter 15 : Purushottama Yoga – अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
भागवद गीता

Chapter 15 : Purushottama Yoga – अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग

श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ श्रीभगवान् बोले- आदिपुरुष परमेश्वररूप मूलवाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखावाले’ जिस संसाररूप पीपलके वृक्षको अविनाशी कहते हैं, तथा...

16 Feb 2025183
Chapter 14 : Guna Traya Vibhaga Yoga – अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग
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Chapter 14 : Guna Traya Vibhaga Yoga – अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग

श्रीभगवानुवाच: परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ श्रीभगवान् बोले- ज्ञानोंमें भी अति उत्तम उस परम ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन…

14 Feb 2025164
Chapter 13 : Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga – अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
भागवद गीता

Chapter 13 : Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga – अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

श्रीभगवानुवाच: इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ श्रीभगवान् बोले- हे अर्जुन ! यह शरीर ‘क्षेत्र’ इस नामसे कहा जाता है और इसको जो…

12 Feb 2025178
Chapter 12 : Bhakti Yoga – अध्याय १२: भक्तियोग
भागवद गीता

Chapter 12 : Bhakti Yoga – अध्याय १२: भक्तियोग

अर्जुन उवाच: एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ।। अर्जुन बोले- जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकारसे निरन्तर आपके भजन ध्यानमें लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वरको और…।

10 Feb 2025152
Chapter 11 : Vishvarupa Darshana Yoga – अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
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Chapter 11 : Vishvarupa Darshana Yoga – अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग

अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्जितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ अर्जुन बोले- मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह…

08 Feb 2025185