विभीषण शरणागति कथा – अध्याय 4: राम ने विभीषण को अपनाया | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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विभीषण शरणागति कथा – अध्याय 4: राम ने विभीषण को अपनाया

Tilak Kathayein12 Apr 202676 views📖 1 min read
विभीषण शरणागति कथा
विभीषण शरणागति कथा का अध्याय 4 — राम ने विभीषण को अपनाया। राम, हनुमान की बात सुनकर और विभीषण की ईमानदारी को जानकर, उसे अपनी शरण में स्वीकार करते हैं और लंका का भावी राजा घोषित करते हैं।

राम ने विभीषण को अपनाया

विभीषण, रावण का त्यागा हुआ भाई, उड़ान भरकर समुद्र पार राम के शिविर में पंहुचा। वह शरण की खोज में आया था, एक ऐसे आश्रय की तलाश में जहाँ धर्म और न्याय का वास हो, रावण के अत्याचार से दूर। राम की सेना में एक विचित्र हलचल मच गई; क्या यह रावण का कोई छल है, या वाकई वह धर्म की ओर मुड़ गया है?

हनुमान का विभीषण के समर्थन में तर्क

राम के शिविर में एक गहरी चिंतन की लहर दौड़ गई। सुग्रीव और अन्य वानर सेनापति विभीषण पर संदेह कर रहे थे। वे रावण की माया और कुटिलता से परिचित थे, और उन्हें डर था कि यह एक चाल हो सकती है। हवा में आशंका और अविश्वास की गंध फैली हुई थी, हर कोई राम के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा था। विभीषण, तट पर खड़ा, शांत था, उसकी आँखों में पश्चाताप और आशा का मिश्रण था। वह जानता था कि उसे अपने इरादे साबित करने होंगे।

"हे राम," हनुमान ने कहा, "मैं मानता हूँ कि विभीषण रावण का भाई है, लेकिन उसकी बातों में सत्यता प्रतीत होती है। उसकी वाणी में धर्म और न्याय के प्रति अनुराग है। उसने स्वयं रावण के अन्याय का विरोध किया है, और अब वह आपकी शरण में आया है। हमें उसे एक अवसर देना चाहिए। क्या हम धर्मराज नहीं हैं? क्या शरणागत की रक्षा हमारा कर्तव्य नहीं?" हनुमान के शब्द, सत्य और विश्वास से भरे हुए थे, शिविर में शांति छा गई।

राम का विभीषण को अभयदान

राम ने सबकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा और न्याय का तेज था। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "विभीषण, तुम भयभीत मत हो। जो कोई भी मेरी शरण में आता है, मैं उसे अभयदान देता हूँ। मैं तुम्हारे हृदय की पवित्रता को पहचानता हूँ। मुझे विश्वास है कि तुम धर्म के मार्ग पर चलने वाले हो।" राम ने आगे बढ़कर विभीषण को गले लगाया। उस स्पर्श में स्नेह और स्वीकृति थी, जिसने विभीषण के हृदय को शांति से भर दिया।

राम का अभयदान सुनकर शिविर में उपस्थित सभी लोगों के मन में शांति का संचार हुआ। राम की करुणा और न्याय की भावना से सभी अभिभूत हो गए। उन्होंने जाना कि राम वास्तव में धर्म के रक्षक हैं, और उनकी शरण में आने वाले का कभी अनिष्ट नहीं हो सकता। राम ने विभीषण को अपना मित्र और सहायक घोषित किया, जिससे विभीषण का आत्मविश्वास और भी बढ़ गया।

लंका का राजा घोषित

राम ने विभीषण को तत्काल लंका का राजा घोषित कर दिया। लक्ष्मण को आदेश दिया गया कि वे तत्काल समुद्र के जल से विभीषण का राज्याभिषेक करें। यह दृश्य अद्भुत था; समुद्र ने जैसे राम के निर्णय का अनुमोदन किया और अपनी लहरों से विभीषण का अभिषेक किया। यह एक नए युग की शुरुआत थी, एक ऐसे युग की जहाँ धर्म की स्थापना होगी और अन्याय का अंत। विभीषण अब राम के साथ मिलकर लंका में धर्म की स्थापना करने के लिए तत्पर था।

राम की कृपा असीम है। उन्होंने न केवल विभीषण को शरण दी, बल्कि उसे लंका का राजा भी बना दिया। यह उनकी शक्ति का प्रमाण है, कि वे दीनहीन को भी उत्थान दे सकते हैं। राम का यह निर्णय आने वाले समय में लंका के भाग्य को बदल देगा और रावण के अन्याय का अंत करेगा। अब युद्ध की तैयारी और गठबंधन की रणनीति बनेगी।

अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में, हमने देखा कि कैसे राम ने विभीषण को शरण दी और उसे लंका का राजा घोषित किया। यह घटना दिखाती है कि सच्ची करुणा और न्याय, किसी भी व्यक्ति को बदल सकते हैं और उसे धर्म के मार्ग पर ला सकते हैं। राम का शरणागत वत्सल भाव हमें सिखाता है कि हमें भी हमेशा ज़रूरतमंदों की रक्षा करनी चाहिए।

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