10 सितम्बर 2026 का पंचांग - तिथि, नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और राहुकाल
चतुर्दशी | कृष्ण पक्ष | श्रावण
⚖️ आज क्या करें, क्या न करें
- •रात्रि जागरण, शिवलिंग अभिषेक, महामृत्युंजय जाप
- •पितृ तर्पण, श्राद्ध, नेतृत्व के कार्य
- •सर्वश्रेष्ठ समय: अमृत (01:57 PM – 03:30 PM)
- •मांसाहार, मदिरा
- •नए उद्यम
- •राहु काल में कोई नया कार्य शुरू न करें (01:57 PM – 03:30 PM)
📅 पंचांग — 10 सितम्बर 2026
🪐 ग्रह दशा — 10 सितम्बर 2026
🕉 ॐ तत्सत् — हरि ॐ तत्सत् 🕉
सभी को गुरुवार की हार्दिक शुभकामनाएं
🌙 आज की तिथि का महत्व
चतुर्दशी · कृष्ण पक्ष
कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि है। रात्रि जागरण और शिव उपासना से पापों का नाश तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
रात्रि जागरण, शिवलिंग अभिषेक, महामृत्युंजय जाप
मांसाहार, मदिरा
⭐ आज का नक्षत्र: मघा
देवता: पितर
मघा राज-सत्ता और पूर्वजों का नक्षत्र है। पितृ कर्म के लिए विशेष महत्वपूर्ण।
पितृ तर्पण, श्राद्ध, नेतृत्व के कार्य
नए उद्यम
📖 पंचांग क्या है और इसका महत्व
पंचांग एक प्राचीन हिंदू कालगणना पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर आधारित है। "पंचांग" शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है — पंच अर्थात् पाँच, और अंग अर्थात् भाग। इस प्रकार पंचांग के पाँच मुख्य अंग होते हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।
हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य — चाहे विवाह हो, गृहप्रवेश हो, व्यापार का आरंभ हो या लंबी यात्रा — पंचांग देखकर ही शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। पंचांग केवल धार्मिक कार्यों के लिए नहीं, बल्कि कृषि, मौसम-परिवर्तन और व्यक्तिगत जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में भी सहायक है।
📜 पंचांग का इतिहास
पंचांग की परंपरा भारत में वैदिक काल जितनी पुरानी है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने आकाशीय पिंडों की गति का सूक्ष्म अवलोकन कर कालगणना की एक सटीक वैज्ञानिक पद्धति विकसित की, जो आज भी करोड़ों घरों में प्रयोग होती है।
वैदिक काल में पंचांग
वेदों और वेदांग ज्योतिष में समय-गणना का उल्लेख मिलता है, जहाँ यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सही तिथि व मुहूर्त जानना अनिवार्य माना गया। कालांतर में सूर्य सिद्धांत और अन्य ज्योतिषीय ग्रंथों ने गणितीय आधार पर पंचांग निर्माण की विधि को और परिष्कृत किया। आर्यभट्ट, वराहमिहिर और भास्कराचार्य जैसे प्राचीन खगोलशास्त्रियों के योगदान से पंचांग गणना अत्यंत सटीक बन सकी।
आधुनिक गणना पद्धति — दृक् सिद्धांत बनाम वाक्य पद्धति
आधुनिक समय में पंचांग मुख्यतः दो पद्धतियों से बनाया जाता है — 'दृक् सिद्धांत', जो वास्तविक खगोलीय अवलोकन और आधुनिक गणित पर आधारित है, और 'वाक्य पद्धति', जो प्राचीन पारंपरिक सूत्रों पर आधारित है। अधिकांश ऑनलाइन पंचांग, जिसमें यह वेबसाइट भी शामिल है, दृक् सिद्धांत का उपयोग करते हैं क्योंकि यह सूर्योदय, सूर्यास्त, तिथि और नक्षत्र की गणना में अधिक सटीकता प्रदान करता है।
🕉 पंचांग के पाँच अंग
तिथि
तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर (देशांतर) से निर्धारित होती है। जब यह अंतर 12 अंश बढ़ता है, तो एक तिथि पूर्ण मानी जाती है। एक चंद्र मास में कुल 30 तिथियाँ होती हैं — पहली 15 शुक्ल पक्ष (चंद्रमा की बढ़ती कला) में और शेष 15 कृष्ण पक्ष (घटती कला) में। प्रत्येक तिथि का अपना विशेष महत्व है — एकादशी व्रत-उपवास के लिए, पूर्णिमा पूजा-अर्चना के लिए, और अमावस्या पितृ-तर्पण के लिए विशेष मानी जाती है। सही तिथि जाने बिना व्रत, पूजा या मांगलिक कार्य करना अधूरा माना जाता है।
आज: चतुर्दशी (कृष्ण पक्ष)वार
वार अर्थात सप्ताह का दिन। भारतीय पंचांग में सातों दिन सात ग्रहों को समर्पित हैं — रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्रमा), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र) और शनिवार (शनि)। प्रत्येक वार के स्वामी ग्रह के अनुसार उस दिन विशेष पूजा-पाठ की परंपरा बनी है — जैसे सोमवार शिव पूजा के लिए और शनिवार शनि देव की उपासना के लिए शुभ माना जाता है।
आज: गुरुवारनक्षत्र
नक्षत्र आकाशमंडल में चंद्रमा के भ्रमण पथ को 27 बराबर भागों में बाँटकर बनाए गए हैं। चंद्रमा प्रतिदिन लगभग एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र में गमन करता है। अश्विनी से रेवती तक — प्रत्येक नक्षत्र का अपना अधिष्ठाता देवता, गुण और स्वभाव है, जो उस दिन की ऊर्जा को प्रभावित करता है। जन्म कुंडली में जन्म-नक्षत्र के आधार पर ही व्यक्ति की राशि और नामकरण तय किया जाता है।
आज: मघायोग
सूर्य और चंद्रमा के देशांतर को जोड़कर योग निकाला जाता है — जब यह योग 13°20' बढ़ता है, तो एक योग पूर्ण होता है। कुल 27 योग हैं, जिनमें सिद्धि, अमृत और सर्वार्थ सिद्धि जैसे योग अत्यंत शुभ माने जाते हैं, जबकि व्यतीपात और वज्र जैसे योग अशुभ माने जाते हैं। महत्वपूर्ण कार्यों से पहले योग की अनुकूलता अवश्य देखी जाती है।
आज: सिद्धकरण
करण तिथि के आधे भाग को कहा जाता है — अर्थात एक तिथि में दो करण होते हैं। कुल 11 करण होते हैं, जिनमें से 7 चर (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) बार-बार आते हैं और 4 स्थिर (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) महीने में एक ही बार आते हैं। विष्टि करण को 'भद्रा' भी कहते हैं, जिसमें विवाह और गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
आज: चतुष्पाद🔍 आज का पंचांग कैसे पढ़ें
ऊपर दी गई तालिका में आज की तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। उदाहरण के लिए, आज 10 सितम्बर 2026 को चतुर्दशी तिथि, कृष्ण पक्ष है, नक्षत्र मघा है और योग सिद्ध चल रहा है। इन पाँचों अंगों को एक साथ पढ़कर यह तय किया जा सकता है कि आज का दिन किस प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। यदि तिथि, नक्षत्र और योग तीनों अनुकूल हों, तो उस दिन को अत्यंत शुभ माना जाता है।
🪔 पंचांग और हिंदू त्योहार
भारत के लगभग सभी प्रमुख त्योहार पंचांग की तिथि पर आधारित होकर मनाए जाते हैं, अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख पर नहीं। दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या को, होली फाल्गुन पूर्णिमा को, और रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसीलिए हर वर्ष इन त्योहारों की अंग्रेजी तारीख बदलती रहती है। नवरात्रि, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे सभी व्रत-त्योहारों की तिथि पंचांग देखकर ही निर्धारित की जाती है।
💍 पंचांग और विवाह मुहूर्त
विवाह हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक है, और इसके लिए शुभ मुहूर्त निकालना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। पंचांग के पाँचों अंगों के साथ-साथ वर-वधू की जन्म कुंडली का भी मिलान किया जाता है ताकि विवाह की तिथि पूर्णतः अनुकूल हो। विवाह मुहूर्त में विशेष रूप से भद्रा करण और राहुकाल से बचा जाता है, जबकि रोहिणी, मृगशिरा और उत्तराफाल्गुनी जैसे नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ माना जाता है।
🏠 पंचांग और गृह प्रवेश
नए घर में प्रवेश करने से पहले गृह प्रवेश मुहूर्त निकालना भारतीय परंपरा में अनिवार्य माना जाता है। इसके लिए पंचांग में शुभ तिथि, अनुकूल वार और शुभ नक्षत्र का चयन किया जाता है, साथ ही यह भी देखा जाता है कि उस दिन कोई अशुभ योग या करण तो नहीं है। गुरुवार, सोमवार और शुक्रवार को गृह प्रवेश के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
💼 पंचांग और व्यापार शुभारंभ
नया व्यापार शुरू करने या दुकान का उद्घाटन करने के लिए भी पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। लाभ चौघड़िया, अभिजित मुहूर्त और अनुकूल नक्षत्र में व्यापार आरंभ करने से सफलता और समृद्धि के योग बनते हैं, ऐसी मान्यता है। बुधवार और गुरुवार को नए व्यापारिक कार्यों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि ये क्रमशः बुद्धि और ज्ञान के ग्रह बुध व गुरु से संबंधित हैं।
🗺️ क्षेत्रीय पंचांग भिन्नताएँ
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पंचांग गणना की परंपरा में थोड़ा अंतर पाया जाता है, विशेषकर माह की गणना के तरीके में।
पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत)
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पूर्णिमांत पद्धति प्रचलित है, जिसमें माह पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिना जाता है। इस पद्धति में कृष्ण पक्ष महीने की शुरुआत में और शुक्ल पक्ष महीने के अंत में आता है।
अमांत पंचांग (गुजरात व दक्षिण भारत)
गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में अमांत पद्धति का प्रयोग होता है, जिसमें माह अमावस्या से अमावस्या तक गिना जाता है — यहाँ शुक्ल पक्ष पहले और कृष्ण पक्ष महीने के अंत में आता है। इसी कारण एक ही तिथि का मास-नाम कभी-कभी उत्तर और पश्चिम/दक्षिण भारत में अलग-अलग दिखाई देता है।
📆 विक्रम संवत और अन्य कालगणनाएँ
भारतीय पंचांग में समय को विक्रम संवत के अनुसार भी गिना जाता है, जो सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर आधारित है और ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलता है। आज विक्रम संवत 2083 चल रहा है। इसके अतिरिक्त शक संवत भी भारत सरकार द्वारा आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग में प्रयोग होता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे रहता है। धार्मिक कार्यों में विक्रम संवत अधिक प्रचलित है।
🌅 सूर्योदय-सूर्यास्त का पांचांगिक महत्व
पंचांग में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदू पंचांग में तिथि, नक्षत्र और अन्य अंगों की गणना सूर्योदय के समय के आधार पर की जाती है, न कि मध्यरात्रि से। इसीलिए यदि कोई तिथि सूर्योदय के कुछ ही समय बाद बदल जाए, तो उस दिन पूरे दिन के लिए वही तिथि मानी जाती है जो सूर्योदय के समय थी। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय का समय भिन्न होने से पंचांग के कुछ विवरण स्थान अनुसार बदल सकते हैं।
⚠️ राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल
राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल — ये तीनों दिन के अशुभ समयखंड माने जाते हैं, जो सूर्योदय-सूर्यास्त के बीच के समय को आठ बराबर भागों में बाँटकर निकाले जाते हैं। इनमें राहुकाल सबसे अधिक प्रचलित और सावधानी से देखा जाने वाला काल है, जिसमें नया कार्य, यात्रा और मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इन तीनों काल का सटीक समय प्रतिदिन और प्रत्येक शहर के लिए अलग होता है — विस्तृत जानकारी के लिए शुभ मुहूर्त पृष्ठ देखें।
🧭 दिशा शूल क्या है
दिशा शूल पंचांग का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है, जो यह बताता है कि किस दिन किस दिशा में यात्रा करना अशुभ माना जाता है। प्रत्येक वार के अनुसार एक निश्चित दिशा में शूल (बाधा) होती है — जैसे सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा में, मंगलवार व बुधवार को उत्तर दिशा में। यदि उस दिशा में यात्रा अनिवार्य हो, तो घर से कुछ खाकर या दर्पण देखकर यात्रा प्रारंभ करने की परंपरा है, जिससे दिशा शूल का प्रभाव कम माना जाता है।
📱 आधुनिक जीवन में पंचांग का उपयोग
आज के तकनीकी युग में भी पंचांग की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। किसान आज भी फसल बोने और काटने के लिए पंचांग और मौसम संबंधी गणनाओं का सहारा लेते हैं। यात्रा की योजना बनाते समय, नई नौकरी शुरू करते समय, या कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते समय भी बहुत से लोग शुभ मुहूर्त देखना पसंद करते हैं। इसके अलावा, ज्योतिष में रुचि रखने वाले लोग अपनी दैनिक राशिफल और ग्रह स्थिति जानने के लिए भी पंचांग का नियमित उपयोग करते हैं।
💻 ऑनलाइन पंचांग बनाम पारंपरिक पंचांग
पारंपरिक रूप से पंचांग छपे हुए पंचांग-पत्रक या पुस्तक के रूप में उपलब्ध होता था, जिसे पंडित और ज्योतिषी वर्षों की गणना के आधार पर तैयार करते थे। आज ऑनलाइन पंचांग वेबसाइटें दृक् सिद्धांत आधारित सटीक खगोलीय गणना का उपयोग कर तुरंत और स्थान-विशेष पंचांग उपलब्ध कराती हैं। इससे सूर्योदय-सूर्यास्त, राहुकाल और मुहूर्त जैसे विवरण अधिक सटीकता से मिलते हैं, विशेषकर जब आप अपने वर्तमान शहर के अनुसार जानकारी चाहते हैं।
⚡ पंचांग पढ़ते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ
पंचांग पढ़ते समय अक्सर कुछ सामान्य भ्रम होते हैं। पहली गलती यह है कि लोग तिथि को अंग्रेजी तारीख की मध्यरात्रि से बदलता मान लेते हैं, जबकि यह सूर्योदय के समय बदलती है। दूसरी गलती यह है कि एक ही तिथि पूरे दिन नहीं रहती — कभी-कभी दो तिथियाँ एक ही दिन में आ सकती हैं (क्षय तिथि) या एक तिथि दो दिन तक रह सकती है (वृद्धि तिथि)। तीसरी सामान्य भूल यह है कि लोग केवल तिथि देखकर मुहूर्त तय कर लेते हैं, जबकि नक्षत्र, योग, करण और राहुकाल का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
🙏 निष्कर्ष
पंचांग भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता की एक अमूल्य धरोहर है, जो हजारों वर्षों की खगोलीय समझ और परंपरा को समेटे हुए है। चाहे आप कोई धार्मिक कार्य करें, व्रत रखें, या कोई महत्वपूर्ण जीवन का निर्णय लें — पंचांग आपको सही समय चुनने में मार्गदर्शन देता है। इस पृष्ठ पर प्रतिदिन अद्यतन पंचांग, शुभ मुहूर्त, चौघड़िया और राशिफल देखकर आप अपने दिन की योजना और भी बेहतर बना सकते हैं।