भगवद गीता – अध्याय 1: अर्जुन की दुविधा: एक परिचय | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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भगवद गीता – अध्याय 1: अर्जुन की दुविधा: एक परिचय

Tilak Kathayein13 Apr 202664 views📖 1 min read
भगवद गीता
भगवद गीता का अध्याय 1 — अर्जुन की दुविधा: एक परिचय। अर्जुन कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में अपने रिश्तेदारों और गुरुओं के विरुद्ध लड़ने के लिए अनिच्छुक हैं, और वह अपने सारथी कृष्ण से मार्गदर्शन मांगते हैं।

अर्जुन की दुविधा: एक परिचय

युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ संपन्न हो चुका था, परन्तु शांति दुर्लभ थी। कौरवों के मन में ईर्ष्या की अग्नि धधक रही थी, जो अंततः महाभारत के युद्ध के रूप में फूटने वाली थी। यह कथा उस क्षण से आरंभ होती है जब दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी हैं, युद्ध के लिए तत्पर।

कुरुक्षेत्र का भीषण दृश्य

सूर्य अपनी प्रचंडता से कुरुक्षेत्र के विशाल मैदान को तपा रहा था। धूल का गुबार आसमान में छाया था, जो युद्ध की भयावहता का संकेत दे रहा था। शंख, नगाड़े और तुरही एक साथ बज रहे थे, जिससे योद्धाओं के हृदय में रोमांच और भय का मिश्रण उत्पन्न हो रहा था। अर्जुन, अपने श्वेत अश्वों से जुते रथ पर सवार, युद्ध के मैदान का निरीक्षण कर रहे थे। उनके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं जो उनके मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट रूप से दर्शा रही थीं। उन्हें अपनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने की कल्पना मात्र से ही पीड़ा हो रही थी।

अर्जुन ने अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहा, "केशव, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो। मैं देखना चाहता हूँ कि मुझे किन लोगों के विरुद्ध युद्ध करना है।" उनके मन में एक अस्पष्ट आशंका घर कर रही थी, एक अनजाना भय उन्हें जकड़ रहा था। वे अपने गुरुजनों, संबंधियों और मित्रों के रक्त से अपनी तलवार रंगने की कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे।

श्रीकृष्ण सारथी बने

अर्जुन की प्रार्थना सुनकर, श्रीकृष्ण ने तत्काल रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा कर दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए अर्जुन से कहा, "पार्थ, देखो, ये तुम्हारे चाचा, दादा, गुरुजन और कुटुंबीजन तुम्हारे विरुद्ध खड़े हैं।" जैसे ही अर्जुन ने भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा अपने चचेरे भाइयों दुर्योधन और उसके भाइयों को देखा, उनका हृदय शोक से भर गया। उनका गांडीव धनुष शिथिल हो गया और हाथ कांपने लगे। उनका शरीर पसीने से तरबतर हो गया। संसार उन्हें अंधकारमय दिखायी देने लगा।

श्रीकृष्ण, जो त्रिकालदर्शी थे, अर्जुन की दुविधा को भली-भांति समझ रहे थे। वे जानते थे कि अर्जुन मोह के जाल में फंस गए हैं और उन्हें इससे बाहर निकालना आवश्यक है। उन्होंने अपने परम भक्त अर्जुन को धर्म और कर्म का उपदेश देने का निश्चय किया, जो आगे चलकर भगवद गीता के रूप में विश्वविख्यात हुआ। उनकी शांत और गंभीर वाणी में एक विशेष प्रकार की शक्ति थी, जो अर्जुन के मन को शांत कर सकती थी।

मोह का आवरण

अर्जुन ने शोक से व्याकुल होकर अपना गांडीव धनुष रथ में रख दिया और श्रीकृष्ण से कहा, "हे गोविंद, मैं अपने कुटुंबीजनों और गुरुजनों का वध नहीं कर सकता। यह युद्ध पाप है और मैं इस पाप का भागी नहीं बनना चाहता।" अर्जुन के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। वे कर्तव्य और मोह के बीच फंसे हुए थे, उन्हें कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। उनका मन अशांत था और वे युद्ध से विमुख होने का निश्चय कर चुके थे, जो आगे की कथा का आधार बनेगा जिसमें श्रीकृष्ण उन्हें सांख्य योग का ज्ञान देंगे, जो सच्चा ज्ञान कहलायेगा।

अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में अर्जुन की दुविधा का चित्रण है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अपने संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बनकर उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन अर्जुन युद्ध से विमुख हो जाते हैं। यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि मोह और कर्तव्य के बीच सही निर्णय लेना कितना कठिन होता है।

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