महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् | संपूर्ण पाठ, अर्थ, लाभ एवं महत्व

॥ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् माँ दुर्गा की शक्ति और महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी के अद्भुत पराक्रम, साहस और असुरों के विनाश का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ भक्तों द्वारा विशेष रूप से नवरात्रि, शुक्रवार और देवी उपासना के समय किया जाता है। माना जाता है कि इसके नियमित पाठ से मन को शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
॥ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे..... ॥
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि... ॥
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते।
मधुमधुरे मधुकैटभ गञ्जिनि कैटभ भञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.. ॥
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि... ॥
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.. ॥
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे.. ॥
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.... ॥
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुर शिञ्जितमोहित भूतपते।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे.... ॥
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि... ॥
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।
निजगुणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय...... ॥
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि... ॥
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.. ॥
भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम्।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.. ॥
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे... ॥
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।
यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुता पमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि.. ॥
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का महत्व
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् देवी दुर्गा की आराधना का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसमें माँ दुर्गा के वीर स्वरूप और अधर्म पर धर्म की विजय का वर्णन मिलता है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र पढ़ने के लाभ
- मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
- भय और नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है।
- आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है।
- माँ दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
- आध्यात्मिक विकास में सहायता मिलती है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ सुबह स्नान के बाद करना शुभ माना जाता है। नवरात्रि, अष्टमी, नवमी और शुक्रवार के दिन इसका विशेष महत्व होता है।
FAQ - महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् किसने लिखा है?
यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र पढ़ने से क्या लाभ होता है?
इसके पाठ से मन को शांति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र कब पढ़ना शुभ होता है?
नवरात्रि, शुक्रवार और देवी पूजा के समय इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
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